Wednesday, August 30, 2006

लेखक परिचय

डॉ.जे.आर.सोनी(Dr.J.R.SONI)

जन्म तिथि
08.06.1954


जन्म स्थान
ग्राम टिकारी, बिलासपुर

शिक्षा
एम.ए.(लोक प्रशासन), विधि स्नातक, व्यवसाय प्रबंध डिप्लोमा, पी.एच.डी


पुरस्कार/सम्मान

0डॉ. अम्बेडकर साहित्य सम्मान

0नई दिल्ली-1994, हिंदी सेवी सम्मान

0ग्वालियर-1996, सत्यध्वज साहित्यकार सम्मान

0भिलाई-1996, दीपाक्षर साहित्य सम्मान भिलाई 1999

0भारतीय कलाकार संघ सम्मान, 1999

0दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति-1999

0गायत्री शक्तिपीठ सम्मान दुर्ग-1999,

0बाबू रेवाराम साहित्य सम्मान रतनपुर-1999

0प्रयास प्रकाशन सम्मान बिलासपुर-1999,

0विक्रम शीला विद्यापीठ से वाचस्पति सम्मान- 1999

0जेमिनी अकादमी पानीपत, आचार्य की मानद उपाधि,

0म.प्र. लेखक संघ-आंचलिक साहित्यकार सम्मान- 2000

0सहस्राब्दी हिंदी सम्मान,

0राजेश्वरी प्रकाशन साहित्य सम्मान, गुना

0सृजन सम्मान 2000 उज्जैन,

0मेघानाथ कन्नौजे स्मृति सम्मान 2001,

0बिलासा कला सम्मान 2002

0राष्ट्रभाषा सम्मान 2002

0सृजन सम्मान रायपुर 2003

0साहित्य वैभव सम्मान बालाघाट 2006

कृतियाँ –
-सतनाम के अनुयायी
- सतनाम की दार्शनिक पृष्ठभूमि
-बबूल की छाँव
-नगमत
-पछतावा
-रंग झांझर
-मारीशस-एक लघु भारत
-श्रीलंका-यात्रा संस्मरण

।।छत्तीसगढ़ी रचनाएं ।।

-मोंगरा के फूल
-मितान
-उढ़रिया
-चन्द्रकला

विदेश भ्रमण
मारीशस, श्रीलंका

संप्रति
संयुक्त संचालक, नगरीय प्रशासन एवं विकास, रायपुर, छ.ग.

पता –
डी-95, गुरुघासीदास कॉलोनी, न्यू राजेन्द्र नगर रायपुर (छत्तीसगढ़)
मोबाईल-98271-11018, फोन-0771-2429644, निवास- 4966826

भाग- सोलह

रामदास एक सम्पन्न किसान बन रहा था। रामवती भी खेती-किसानी का काम सम्हाल रही है। रामदास दादाजी को स्मृति पटल पर अंकित पाता है कि कभी उसके घर पर भी धन धान्य भरा पड़ा रहता था। सैकड़ों आदमी प्रतिदिन भोजन करते थे। मणिदास की मृत्यु के बाद धन सम्पत्ति कहां चली गई। माँ, रामवती, माधुरी, चन्द्रशेखर को दो जून का भोजन भी पर्याप्त नहीं मिल पाता था। रामवती ने किसानों के खेतों में मजदूरी करके बच्चों का पालन-पोषण किया और पढ़ाया-लिखाया था। रामदास कहता है – धन्य हो भारतीय नारी, रामवती साक्षात देवी हो तुम। लोगों के ताने, जलालत सहकर बच्चों को बड़ा किया। मेरे सात जन्म में भी रामवती पत्तनी बने सतनाम साहेब से यही प्रार्थना करूंगा। रामदास की आँखों से आंसू बहने लगते हैं। रामवती यह देख-सुनकर रो पड़ती है। रामदास के चरणों में सिर रख देती है। जब तु हो, तो मैं हूं। जब तुम नहीं थे, तो मैं भी नहीं थी। मैं तो एक लाश की तरह जीती थी। रामवती बताती है – धन्य है मेरी सास शांति बाई। मेरी माँ से ज्यादा देखभाल करती रही है। मजाल है कि रात के सूने घर में कोई मरद आ जाए। लाठी से पीट-पीट कर घायल करना पसंद था। माँ के संबल से ही मैं यहां गाँव में रह पाई। यहां सूने घर में बदमाशों की गिद्ध दृष्टि रही। फिर मैं जवान स्त्री कहां से परुष का मुकाबला कर पाती। इस माँ के कारण ही पुरुष के समान रही हूं। मैंने इसी डर से नसबंदी करा ली थी। कोई ऊंच-नीच न हो जाए। प्रतिदिन मैं डर-डर के जीती थी। भले मैं भूख से मर जाती थी। परन्तु किसी लालच में नहीं पड़ी। खेतों में काम करने जाऊं तो वहां भी भेड़िये बैठे थे। किसी प्रकार आबरू बचाकर जीती रही हूं। रामदास कहता है – रामवती मैंने तुझे तो दूसरा विवाह करने को कहा था। तुम्हारी लाख गलतियों को माफ कर देता। मैं भी तो इंसान हूं। औरत जात भी इंसान है। उसकी भी अपनी आवश्यकताएं हैं। स्त्री-पुरुष दोनों की आवश्यकताएं होती हैं जानकर मैं इंसानी जजबात को समझता हूं। फिर तो मैं जेल में था, जो कभी बाहर नहीं निकल सकता था। रामवती बीते दिनों को याद कर रोने लगती है। घर में एक बीजा चावल नहीं था। उधर चन्द्रशेखर बार-बार खाने को मांगता था। मैं तो पानी पीकर पेट भर लेती थी। परन्तु बच्चे को तो भोजन चाहिए था। मनमोहन ने बहुत साथ दिया। वक्त बेवक्त सहायता कर देते थे। चन्द्रशेखर को गोद में लेकर बाजार, गली में घुमाता था।

रामवती आंसू पोंछते हुए बताती है – मनमोहन से उसके अवैध संबंध हैं कहकर महिलाएं ताने देती थीं। उसकी पत्नी भी शक किया करती थी। देवर-भाभी में सांठगांठ है। परन्तु मनमोहन ने कभी आँख उठाकर नहीं देखा है। कहां पर टिकुली लगी है। भइया मेरे कारण सजा भुगत रहा है, इसलिए मेरी जवाबदारी है आप लोगों की देखभाल करना। मनमोहन, जगतारण दास बड़े ससुर बहुत देखभाल करते रहे हैं। दस वर्ष तक मैं अकेली महिला कैसे दरिंदों के से लड़ती। मैं तो कब की मर गई होती। चन्द्रशेखर, माधुरी के कारण जीवित हूं। रामदास रामवती को बिसरे दिनों को भूल जाने के लिए बोलता है। रामवती का आलिंगन करता है। रामवती भी उसकी बाहों में झूल जाती है। रामदास रामवती को छेड़ता है कि पचास साल की उमर में तुम्हारे गाल सेब के समान हैं। भरापूरा शरीर है। कौन नहीं आकर्षित होगा। कामदेव भी ललचा जाए, ये तो गाँव के छोकरे हैं। रामवती शरमा कर कहती है क्यों छेड़ते हो जी। भला इस उमर में भी कोई पूछेगा ? रामदास कहता है – मैं तो तुम्हारा दीवाना हूं। रामवती कहती है आप तो बचपन से लट्टू कक बराबर घूम रहे हो और दूसरा तो नहीं है। लगातार मैं दस वर्षों से अपनी मन की इच्छा को मार रही हूं। इसी कारण मैंने नसबंदी करा दी थी। भगवान ने ऐसा कुछ नहीं किया। भगवान ने मेरे दोनों बच्चों को नौकरी पर लगा दिया है। अब मैं मर जाऊं तो कोई चिंता नहीं रहेगी। रामदास रामवती से कहता है – मेरी छोटी सी भूल – एक क्रोध के कारण हत्या हो गई थी। यदि मैंने तुम्हारी बात मान ली होती तो ये दिन देखने नहीं पड़ते। रामवती कहती है क्रोध आदमी को शैतान बना देता है। मैं हत्या करने के बाद गाँव नगाराडीह चला गया था। बीच में अरपा नदी के पानी की धार में तीन घण्टे रोता रहा। मन हुआ की पानी में डूब कर मर जाऊं। परन्तु माधुरी, चन्द्रशेखर के मोह ने मुझे मौत के मुँह से बचा लिया। तलवार लाठी को गहरा बहाव पानी में फेंक दिया। तलवार रात के अंधेरे में कहां गया मुझे नहीं मालूम। गीले कपड़े मे मैं नगाराडीह चला गया।

रामवती विगत दस वर्ष के बीते दिनों को याद करके पछतावा कर रहे थे। मनमोहन उसी समय आकर बताता है कि भइया सरपंच का चुनाव आप लड़ो। समाज के मुखिया तो बन गए हो। परन्तु रामदास चुनाव लड़ने से मना कर देता है। हठ करके मनमोहन फार्म को पकड़ा देता है। रामवती भौजी को समझाने को कहकर चला जाता है। रामदास परछी में आकर चार-पाँच लोगों से पूछता है कि किसको सरपंच बना रहे हो। सभी उसे सरपंच का चुनाव लड़ने के लिए आग्रह करते हैं। रामदास रामवती से पूछकर बताऊंगा कहता है। उधर रामवती रामदास को चुनाव लड़ने के लिए सहमति दे देती है। रामदास सरपंच पद हेतु फार्म भर देता है। रामदास के विरुद्ध सामलदास का लड़का हिंछाराम फार्म भरकर चुनाव में खड़ा हो जाता है। गाँव दो भागों में बंट जाता है। रामदास का प्रचार-प्रसार मनमोहन कर रहा था। रामदास बीस हजार रुपए खर्च कर चुका था। विरोधी लोगों ने पचास हजार खर्च करके सारे वोट खरीद लिए थे। गाँव में प्रचार किया गया। एक हत्यारा को सरपंच बनाओगे तो गाँव में गुण्डागर्दी बढ़ जाएगी। सजायाफ्ता अपराधी को वोट देना आत्महत्या होगी। इस प्रकार के नारे घरों की दीवारों पर गेरू से लिखे गए। रामदास की साख में गिरावट आई। एक प्रकार से रामदास का सामाजिक बहिष्कार कर एक तरफा वोट हिंछाराम को देकर सरपंच चुनाव जिता दिया। रामदास को अपराद के कारण चुनाव हारना पड़ा। वह बहुत मायूस होकर गाँव से माधुरी के पास रायपुर चला गया। रामदास को बहुत पछतावा हो रहा था। माधुरी ने बहुत समझाया – पिताजी क्या कमी है ? क्या जरुरत थी चुनाव लड़ने की। गाँव के लोग हमसे जलते हैं। गाँव को आप अपना समझते हो। गाँव तो अब राजनीति का अखाड़ा बन गया है। जबसे पंचायती राज आया है तब से सरपंच का पद बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। न्यायालयों में बेतहाशा मामलों की वृद्धि हुई है। निपटारा नहीं हो पा रहा है।माधुरी कहती है कि पिताजी आप रायपुर में मेरे साथ ही रहिए। आप जेल में अच्छा काम कर रहे थे। रायपुर में रहकर छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के आंदोलन में भाग ले सकते हो। लगभग दस बारह साल तो लग जाएंगे। संजय सिंह भी बाबूजी को समझाता है। अब शेष जीवन मानव कल्याण, भजन, पूजा, कीर्तन में लगाइए। समाज अभी पिछड़ा और अशिक्षित है। इसलिए शिक्षा का प्रसार गाँव में नहीं हुआ है। इसलिए गाँव में शिक्षित चुनाव नहीं जीत सकते। गाँव वालों को साथ में रहने वाला सरपंच ही चाहिए। रामदास हां, हूं करता है। रामवती भी समझाती है, परन्तु रामदास नहीं मानता।

माधुरी से बोलकर चन्द्रशेखर को बुलवाता है। रायपुर पुलिस लाइन में पदस्थापना थी। चन्द्रशेखर शाम को आ जाता है। चन्द्रशेखर के विवाह की चिंता सताती है। परन्तु उसके समाज वाले लड़की देने से इंकार कर देते हैं। रामदास को पछतावा होता है। रामदास बहुत दुखी मन से इस दुनिया को छोड़ने का निर्णय ले लेता है। मेरे एक अपराध के कारण कोई अपनी लड़की नहीं देना चाहता है। इसलिए मैं बच्चों के सुखी जीवन में विष नहीं घोलना चाहता। चन्द्रशेखर, माधुरी, संजय को रुक-रुक कर देखता है। जी भर कर देखता है। मन भर जाने के बाद संजय सिहं को कहता है – बेटा चन्द्रशेखर का ध्यान रखना। इसका विवाह भी किसी गरीब लड़की से करा देना। संजय कहता है – बाबूजी मेरी बुआ की लड़की है, अच्छी है। इसके लिए ब्याह दूंगा। बुआ इंकार नहीं करेगी। कटनी में बुआ रहती हैं। फूफाजी हाई स्कूल में प्राचार्य हैं। रामदास कहता है – जो मिले, शादी करा देना। रामवती, रामदासकुछ दिन रहकर गाँव चले जाते हैं। रामदास को पता चलता है कि गाँव के लोग बस द्वारा गिरौदपुरी मेला जा रहे हैं। मनमोहन भी अपनी पत्नी बच्चों के साथ जा रहे हैं। रामवती से कहता है – चलो हम लोग भी तीनों माँ के साथ मेला देखने जाते हैं। गिरौदपुरी का मेला प्रमुख तीर्थ स्थल है। दूसरे दिन बस से रामदास गिरौदपुरी मेला पहुंच जाते हैं। सभी दर्शनार्थी लाइन में लगकर बाबाजी के चरण पादुका, जोड़ा जैतखाम, दुधिया सांप के दर्शन करते हैं। तीन घण्टे बाद दर्शन कर पाते हैं। लाखों की भीड़। रामवती अगरबत्ती, नारियल चढ़ाकर पूजा करती है। जोड़ा जैतखाम के पुराने ध्वज को फर-फर फहराते देखती है। अच्छा लगता है। शांति बाई को दिखाते हैं। सभी लोग अमृतकुण्ड के दर्शन करते जाते हैं। अपार जनसमूह की भीड़ रहती है। पैर रखने की जगह भी नहीं होती है।

चन्द्रशेखर की मेला ड्यूटी लगी रहती है। तीन दिन पहले आया रहता है। अमृतकुण्ड के पास ड्यूटी लगी होती है। शांति, रामवती, रामदास के चरण स्पर्श करता है। कुएं के आसपास सैकड़ों आदमियों की भीड़ थी। बच्चे कुएं में झांक कर देख रहे थे। स्वच्छ निर्मल पानी भरा था। सभी लोग गुरू की कृपा समझकर पानी पी रहे थे। बाल्टी से निकाल-निकाल कर पानी पीकर तृप्त हो रहे थे। रामदास का परिवार कुएं के चारों ओर परिक्रमा कर रहा था। चन्द्रशेखर उन्हें सब कुछ दिखा रहा था। कुएं की दीवार भारी भीड़ के कारण अचानक धसक जाती है। सभी यात्री मिट्टी-पत्थर के ढेर के साथ सहसा कुएं में दब जाते हैं। रामदास गले तक मिट्टी में धंस जाता है। साथ में शांति, रामवती, चन्द्रशेखर भी मिट्टी के ढेर में डूब जाते हैं। लगभग पचीस आदमी दबे रहते हैं। रामदास दबे रहने के बाद भी अपने हाथों से पाँच बच्चों को गड्ढे से बहर फेंक देता है। उधर मेला में कुण्ड के धसकने की जानकारी मिल जाती है। इधर रामदास कुएं में मिट्टी के ढेर के साथ अंदर समा जाता है। रामदास का पूरा परिवार कुएं में मिट्टी के ढेर के साथ अंदर समा जाता है। रामदास मरते वक्त देखने वाले लोगों से दोनों हाथ जोड़कर जय सतनाम एवं जय छत्तीसगढ़ के नारे लगाता हुआ काल कवलित हो जाता है। मनमोहन एवं गांव वाले सभी इस हादसे से बहुत रोते हैं। मनमोहन मेला अधिकारी को घटना की रिपोर्ट देता है। पुलिस एसडीओ को बताता है कि मृतक रामदास की बेटी श्रीमती माधुरी और संजय सिंह दोनों जज रायपुर में ही पदस्थ हैं। वायरलेस से जानकारी दे दीजिए। एसडीओपी ने तत्काल कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक को इसकी खबर दी। कलेक्टर ने माधुरी सिंह को घटना की जानकारी दी। माधुरी, संजय सिंह तत्काल छुट्टी लेकर कार से घटनास्थल में रोते हुए आए। इस हादसे में पूरे परिवार के लोग मारे गए। बची थी तो सिर्फ माधुरी सिंह।

मेला में भगदड़ मच जाती है। सौ आदमी दब कर मर गए। पुलिस वाले कुएं के आसपास को अपने घेरे में ले लेते हैं। देखने के लिए आदमियों की भीड़ कुण्ड की ओर आने लगी। हजारों लोगों की भीड़ ने देखा। पुलिस शांति व्यवस्था बना रही थी। आखिर उस क्षेत्र को प्रतिबंधित कर दिया गया। भीड़ को इधर-उधर भेजा गया। लोग अपने रिश्तेदारों को खोज रहे थे जो परिसर में भगदड़ के कारण भागे जा रहे थे, एक-दूसरे से जानकारी ले रहे थे। कलेक्टर, कमिश्नर, पुलिस अधीक्षक दल-बल सहित चार बजे शाम को आते हैं। मलमा, मिट्टी हटाने का काम एसडीएम ने शुरू करवा दिया था। गाँव वाले भी सहयोग कर रहे थे। कलेक्टर स्वयं देख-रेख कर रहे थे। मिट्टी हटाना खतरे से खाली नहीं था। धीरे-धीरे मिट्टी धंस रही थी। रायपुर से होमगार्ड के जवान भी बुलाए गए थे। गाँव वाले एवं होमगार्ड के जावानों ने एक-एक करके पच्चीस लाशें निकाली। लाशों में एक सिपाही चन्द्रशेखर जोगी भी था। मनमोहन ने चारों लाशों को पहचान कर अलग कर लिया था। लाश पहचानने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ रही थी। कलेक्टर, कमिश्नर तुरंत मुख्यमंत्री को सूचना देते हैं। माधुरी सिंह रोते-रोते लाश के पास आती है। सब लाशों को देखकर वह जोर से रो पड़ती है। मनमोहन एवं गाँव वाले समझाते हैं, संजय सिंह कलेक्टर को कहता है कि ये मेरे सास-ससुर एवं साले की लाश है। खाकी वर्दी में चन्द्रशेखर की लाश पड़ी थी। पुलिस अधीक्षक सिपाही की मृत्यु से दुखी थे। साथ में माँ-पिताजी, दादी के शव। वहां पर हृदय विदारक करुण क्रंदनमय दृश्य बन गया था। सभी लोगों के नेत्रों से अश्रु धारा बह रही थी। गमगीन माहौल था. कलेक्टर, कमिश्नर शांति व्यवस्था भंग न हो कहकर, मेडिकल आफिसर से पोस्टमार्टम रिपोर्ट लेकर शवों को सुपुर्द कर देते हैं। जिन लाशों की शिनाख्त नहीं हो पाई थी उसे पुलिस वाले दफनाने की कार्यवाही करती है। मनमोहन और माधुरी सिंह ने सोचा कि गाँव ले जाकर क्या करेंगे, यहीं सम्मान के साथ लाखों लोगों के साथ दफना देते हैं। कलेक्टर, कमिश्नर, पुलिस अधीक्षक, सभी अधिकारी, समाज के हजारों लोग उन मृतकों को मिट्टी देते हैं। जंगल के भीतर दफनाने के लिए दस गड्ढे खोदते हैं। एक-एक कर दस लाशों पर मिट्टी डालते हैं। माधुरी सिंह का पूरा परिवार दफन हो गया। सभी अधिकारी माधुरी संजय सिंह को बार-बार सांत्वना देते हैं।

रामसनेही महंत सतनाम साहेब के नाम मंत्र पढ़कर लाशों को दफनाते हैं। रामसनेही महंत कहता है कि बेटी रामवती मेरे छेटे भाई आसकरणदास की बेटी थी। तुम तो मेरी नातिन हो। मत रोओ, माधुरी मत रोओ। रुंधे गले से माधुरी ने अंतिम मिट्टी डाली। शांति, रामवती, रामदास चन्द्रशेखर पंचतत्व में विलीन हो गए। रामसनेही ने कहा – जब तक गुरूजी का नाम रहेगा, जोगी परिवार को मेला के वक्त लोग याद करते रहेंगे।

माधुरी निःसहाय बैठी रो रही थी। संजय सिंह माधुरी को सम्हालने में लगा है। रात्रि में मनमोहन एवं उसके साथी गाँव चले जाते हैं। गाँव में समाचार सुनकर हा-हाकार मच जाता है। शोक की लहर फैल जाती है। तीसरे दिन के मेले में माननीय मुख्यमंत्री, श्री धनेश पाटिला जी, डीजी धृतलहरे, मंत्री सांसद परसराम भारद्वाज, डॉ. खेतानराम, सांसद केयूर भूषण, पवन दीवान, बंशीलाल धृतलहरे वरिष्ठ कांग्रेसजन आते हैं। सभी मृतकों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। मुख्यमंत्री सभी मृतकों के परिजनों को एक-एक लाख रुपए अनुदान देने की घोषणा करते हैं। मुख्यमंत्री जी रायपुर कलेक्टर को भुगतान करने के निर्देश देते हैं। गिरौदपुरी के विकास हेतु बीस लाख रुपए देने की घोषणा करते हैं। मेला शोक में डूबारहता है। कोई उत्साह नहीं रहता है। सभी मेला समाप्ति पर अपने-अपने घर चले जाते हैं। माधुरी संजय सिंह को मुख्यमंत्री, मंत्रीगण सांत्वना देते हैं। भगवान की लीला को अपरंपार बताते हैं। माधुरी सिंह रायपुर अपने निवास आ जाती है।

संजय सिंह रायपुर में तीन दिन में क्रियाकर्म कर हजारों लोगों को भोजन कराते हैं। सभी गणमान्य लोग सम्मिलित होते हैं। रायपुर कलेक्टर माधुरी सिंह को चार लाख रुपए का चेक प्रदान करते हैं। संजय माधुरी विचार करते हैं, क्यों न गाँव में कन्या स्कूल रामवती रामदास प्राथमिक पाठशाला खोल दिया जाए। मनमोहन गाँव में दशकर्म करता है। माधुरी संजय सिंह लिवाकर ले जाता है। दशनहा वन में आसपास के हजारों व्यक्ति शामिल होते हैं। रात्रि में पांच हजार लोग भोज में भोजन ग्रहण करते हैं। माधुरी ने दिल खोलकर खर्च किया। एक लाख रुपए खर्च करने की योजना थी।

माधुरी संजय सिंह ने स्कूल खोलने एवं समस्त संपत्ति, मकान, खलिहान को स्कूल में दान कर देती है। पाँच लाख रुपए से भवन का निर्माण के लिए देती है। समस्त उपस्थित लोगों ने माधुरी सिंह की भूरि-भूरि प्रशंसा की। भोज ग्रहण करने के बाद सभी मेहमान चले जाते हैं। मनमोहन सभी रिश्तेदारों को पगड़ी रस्म के लिए रोक कर रखता है। दूसरे दिन गुरू एवं भांजा को दक्षिणा देकर बिदा कर देते हैं। बिदा के बाद माधुरी घर में आ जाती है। रामदास माधुरी के शरीर में प्रवेश कर बोलता है। माधुरी अर्धचेतना में रहती है। रामदास कहता है – मेरी छोटी सी भूल आवेश में आकर क्रोध की ज्वाला में जलकर मैं हत्या कर डाला। मुझे जीवन भर पछतावा रहा। मेरे अपराध के कारण मेरा परिवार बर्बाद हो गया था। मेरे मरने के बाद ही मुझे शांति मिली है। मैं संत पुरुष साहेब की गोद में सोया हूं। मुझे असीम शांति मिल रही है। बेटी अब दुख मत मनाना। अपना काम में मन लगाकर करना। मैं अब जा रहा हूं। रामदास सभी परिवार के सदस्यों को माधुरी के माध्यम से देखकर तृप्त हो गया। रामदास की अतृप्त आत्मा तृप्त होकर सतनाम साहेब के पास चली गई।

माधुरी होश में आती है। संजय पानी पिलाता है। माधुरी पसीने-पसीने हो जाती है। माधुरी एवं सभी सदस्य बहुत रोते हैं। सबको संजय चुप कराता है। आंसू पोंछते हुए माधुरी बताती है – पिताजी आए थे। सबको देखकर चले गए। माधुरी स्कूल बनाने के लिए पाँच लाख रुपए एवं मकान, खेत की देखभाल मनमोहन को देकर चली जाती है। माधुरी स्कूल निर्माण समिति की अध्यक्ष एवं मनमोहन को उपाध्यक्ष, पूरन, उत्तमदास, पद्मन को सदस्य मनमोहन को भार सौंपकर रायपुर चली जाती है। मनमोहन साल भर में स्कूल भवन बनवा देता है। इसका उद्घाटन माधुरी संजय सिंह अपने हाथों से 1 जुलाई को करती है। गाँव के पाँच लड़कों को शिक्षक बना देते हैं। गाँव एवं आसपास की बालिकाएं आकर पढ़ती हैं। गाँव एवं आसपास की सभी लड़कियों में शिक्षा का विकास होने लगता है। स्कूल अच्छा चलने लगता है। लड़कियां वहां से पढ़ाई कर बिलासपुर पढ़ने चली जाती हैं।

माधुरी बीच-बीच में गाँव जाकर देखभाल करती रहती थी। रामदास की आत्मा को शांति मिल गई थी। रामदास जीवनभर अपराध के बोझ से दबा रहा। जीवनभर पछताता रहा। मरने के बाद भी पछताया। अब इससे उसे मोक्ष मिल गया था। सतनाम साहेब ने एक जांबाज वीर सिपाही, सच्चे देशभक्त, एक सच्चा इंसान, दीनदुखियों के साथी, भूखे नंगे के हमदर्द रामदास को अपने महान महाआत्मा में विलीन कर लिया।
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समाप्त
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भाग- पन्द्रह

जेल अधीक्षक, रायपुर द्वारा अपनी अनुशंसा सहित नोटशीट एवं आवेदन जिला मजिस्ट्रेट के पास स्वीकृति हेतु भेजता है। रामदास एवं दो अन्य कैदियों को अच्छे चाल-चलन और आठ वर्ष तक सजा भुगतने के बाद 15 दिन के पैरोल पर घर जाने के लिए स्वीकृति प्रदान कर दी जाती है। रामदास को नए कपड़े एवं आने-जाने के ट्रेन, बस किराए के रूप में एक हजार रुपए विभाग से मिलते हैं। शिल्पी के रूप में एकत्र जो भी रुपए जेलर साहब रामदास को देता है। रामदास केन्द्रीय जेल से प्रातः आठ बजे छूट जाता है। रामदास सबसे पहले पास के बजरंगबली मंदिर में मत्था टेकता है। जेलर साहब को नमस्कार करके रायगढ़ जाने के लिए रिक्शे से बाजार चला जाता है। वहां से माँ के लिए साड़ी, रामवती के लिए साड़ी, चन्द्रशेखर के लिए पैंट-शर्ट खरीद कर अपने लिए पैंट-शर्ट लेकर रेलवे स्टेशन रायपुर से मेल में बैटकर रायगढ़ पहुंच जाता है। रायगढ़ रेल्वे स्टेशन से रिक्शा में बैठकर चक्रधर नगर के बंगलों में दाखिल हो जाता है। रामवती और माँ की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। माधूरी भी खुशी-खुशी पिताजी के चरण स्पर्श करती है। रामदास माँ के चरण छूकर प्रणाम करता है। शांति बाई खुशी के आंसू बहाती है। कहती है बेटा, देखने के लिए आँखें पथरा रही थीं। चन्द्रशेखर भी रायगढ़ में रहता है। सभी एक जगह मिल जाते हैं। पूरा परिवार एक साथ बैठकर जमीन पर भोजन करते हैं। रामदास सबके कपड़े निकाल कर देता है। माधुरी कहती है इसकी क्या जरूरत थी, बाबूजी क्यों लाए। रामदास कहता है – बेटी मुझ गरीब अपराधी बाप के पास और कुछ नहीं था। मेरी बुद्धि के अनुसार खरीद लाया हूं। मेरा छोटी सी भेंट। माँ, रामवती और माधुरी को साड़ी बहुत पसंद आती है। माधुरी माँ पिताजी के लिए अलग कमरे बिस्तर लगा देती है। दादी के साथ माधुरी सो जाती है। रामवती दस वर्ष के बाद पति के साथ सोती है। पति सुख पाकर रामवती निहाल हो जाती है। अपनी अतृप्त इच्छाओं को पूरा करती है। रात भर दोनों बातचीत करते गुजार देते हैं। सुबह एकाएक दोनों की गहरी नींद लग जाती है।

माधुरी सुबह उठकर सबके लिए चाय बनाकर लाती है। दादी, चन्द्रशेखर बैठकर चाय पीते हैं। मम्मी-पापा के उठने का इंतजार करते हैं। रामदास ने बहुत दिनों के बाद पत्नीसुख पाया था। एकसंग सोने के कारण बहुत रात तक नींद नहीं आई। सुबह दस बजे तक सोते रहे। माधुरी जब नाश्ता बनाकर कार्यालय जाने की तैयारी करती है। रामवती जल्दी-जल्दी उठती है, घड़ी देखती है दिन के दस बज रहे थे। रामवती शरमा जाती है। माधुरी ने सारा काम निपटा लिया था। भोजन पकाकर रख देती है। रामवती मुँह धोकर बेटी के लिए तैयारी करती है। माधुरी स्नान करके जल्दी-जल्दी चावल, दाल, सब्जी खाकर आफिस जाने के लिए तैयार होती है। फिर अन्य जजों के साथ जीप में न्यायालय चली जाती है।

इधर रामवती रामदास के लिए चाय बनाकर लाती है। रामदास प्रश्न करके चाय पीता है। रामवती के हाथ की चाय का अलग स्वाद रहता है। चन्द्रशेखर और शांतिबाई जेल के बारे में रामदास से कई बातें पूछते हैं। रामदास सबकुछ जानकारी देता है। एक से बढ़कर एक खूंखार अपराधियों के बारे में बताता है। रामवती स्नान करके रसोई में चली जाती है। दिन के बारह बजे सब मिल बैठकर भोजन करते हैं। माधुरी, रामदास, माँ, दादी को चन्द्रशेखर को जीप में बैठाकर गौरीशंकर मंदिर दर्शन कराने ले जाता है। रामदास मंदिर देखकर बहुत खुश होता है। रामवती फूल, अगरबत्ती, नारियल चढ़ाती है। माधुरी भी पूजा-अर्चना करती है। रामदास करीब एक सप्ताह तक रायगढ़ मे रहता है। रामवती को लेकर गाँव चला जाता है। दो दिन गाँव में रहते हैं। फिर गाँव से अपनी ससुराल सेंदरी गाँव चले जाते हैं।

वहां एक दिन रहकर बिलासपुर से रायगढ़ चले जाते हैं। रामवती पति को पुनः पाकर खिल गई थी। रामवती को मालूम था कि रामदास पन्द्रह दिनों के बाद फिर जेल चला जाएगा। रामदास चौदह दिन बढ़िया परिवार के साथ गुजारता है। रामदास सोलहवें दिन मेल से रायगढ़ से रायपुर चला जाता है। पेरोल का समय बीत जाता है। सुबह 11 बजे जेल में आकर जेलर साहब को उपस्थिति देता है और रामदास की जेल की दिनचर्या पहले जैसी चलने लगती है।

रामदास के अच्छे चाल-चलन के कारण आजीवन सजा दस वर्ष में पूरी हो जाती है। दो वर्ष की सजा और काटकर रामदास अपने गाँव आ जाता है। कुछ दिन गाँव में रहने लगता है। रामदास की उम्र पचास वर्ष हो गई थी। मनमोहन कुछ दिन तक अपने घर में खइलाता है। फिर रामदास माधुरी के पास रायगढ़ चला जाता है। रामवती, शांति, चन्द्रशेखर कुछ दिन रायगढ़ में रहते हैं। चन्द्रशेखर बी.ए. पास कर लेता है। माधुरी अपने पास रायगढ़ में रखकर पढ़ाती है। चन्द्रशेखर पिताजी के समान 6 फीट लम्बा तगड़ जवान हो गया था। माधुरी भाई को भी नौकरी से लगा देना चाहती थी।

माधुरी का प्रमोशन प्रथम श्रेणी जज के रूप में रायपुर में हो जाता है। माधुरी को बंगला कलेक्टरेट के पीछे मिलता है। पूरा सामान लेकर माधुरी रायपुर आ जाती है। चन्द्रशेखर, रामवती, शांति सभी रायपुर आ कर कुछ महीने रहते हैं। रामवती कहती है कि बाबूजी पुलिस विभाग में तुम्हारी जीपीएफ की राशि जमा होगी। उसे निकलवा लो। जितनी हो। रामदास बिलासपुर पुलिस अधीक्षक से मिलता है। मसीह बाबू जब भर्ती हुआ था तब छोटे बाबू थे। उसने रामदास के शौर्य और साहस को सुना था। रामदास आवेदन बनाकर पुलिस अधीक्षक से मिलता है। अपना परिचय देता है – सर, मैं पुलिस विभाग में सहायक उपनिरीक्षक था, कुछ छोटी सी गलती के कारण मेरे हाथ से एक बदमाश की हत्या हो गई थी। जिसके कारण मुझे आजीवन कारावास की सजा हुई थी। दो माह हुए जेल से छूटा हूं। पुलिस अधीक्षक बैठने के लिए बोलते हैं। कहते हैं – रामदास तुम्हारे साहस एवं शौर्य के किस्से मैंने अभिलेख में देखे हैं। तुम्हारी जांबाजी साहस के लिए पुलिस विभाग गर्व करती है। नियति का खेल है, क्या करोगे। चपरासी चाय लेकर आ जाता है। रामदास चाय पीने लगता है। पुलिस अधीक्षक मसीह बाबू को बुलाता है। कहता है – बड़े बाबू आज ही पूरा हिसाब करके रामदास को चेक दे दो। रामदास कहता है – सर, जब भी आप बुलाएं मैं आ जाऊंगा। मेरी पुत्री प्रथम श्रेणी सिविल जज रायपुर में है सर। मैं वहीं कुछ दिनों से रह रहा हूं। एस.पी. साहब एक सप्ताह बाद रामदास को बुलाते हैं। मसीह बाबू पुराने अभिलेख निकालकर अस्सी हजार रुपए निकालता है। सभी अभिलेख, सेवा पुस्तिका, जीपीएफ पास बुक व्यक्तिगत सिफारिश के लिए टेबल पर रख देता है। पुलिस अधीक्षक स्वीकृत कर देता है। अंतिम भुगतान हेतु व्हाउचर बनाकर ट्रेजरी में भेज देता है। रामदास बिलासपुर से गाँव चला जाता है। गाँव में पाँच एकड़ केत खरीदने के लिए सौदा करता है। बढ़िया सिंचित खेत रहता है। गाँव के किनारे सड़क के पास रहता है। पचास हजार रुपए में पाँच एकड़ खेत लेता है। शेष दस हजार रुपए बीज, खाद, निंदाई, गुड़ाई के लिए। रामदास के पास आठ एकड़ भूमि हो जाती है। एक नौकर भी खेत में काम करने के लिए रख लेता है। गाँव के पुराने घर की मरम्मत कराता है। रामदास गाँव में रहने लगता है। रामवती और माँ को भी गाँव ले आता है। चन्द्रशेखर रायपुर में रहकर पढ़ने लगता है।

माधुरी अकेली पड़ जाती है। माधुरी रामदास को प्रतिमाह पाँच हजार रुपए भेज देती थी। रामदास की स्थिति अच्छी हो जाती है। गाँव में गरीब लोगों को रुपए उधार में बीस हजार रुपए देता है। इस वर्ष फसल भी अच्छी होती है। रामदास के घर में रखने के लिए जगह नहीं रहता है। किसान लोग धान काटने के बाद ब्याज सहित रुपए वापस कर देते हैं। रामदास कुछ रुपए मिलाकर दो एकड़ जमीन और खरीद लेता है। रामदास रामवती का मन पहले जैसा लगा रहता है। दादा मणिदास की तर्ज में चलकर कोई भूखा नंगा दरवाजे से खाली हाथ नहीं जा पाता था। गाँव में भाईचारा, प्रेम-व्यवहार बनाकर वह चल रहा था।

रामवती माधुरी को देखने रायपुर जाती है। रामदास, रामवती दोनों विचार कर माधुरी को विवाह के लिए राजी कर लेते हैं। रामदास कहता है कि तुम अपने मनपसंद वर से शादी कर लो। समाज को मारो गोली। सड़े समाज में क्या रखा है। आजकल सभी समाजों में पढ़े-लिखे लड़कों की कमी नहीं है। परन्तु मेरे कारण सामाजिक बहिष्कार हो गया है। इसका बहुत पछतावा है। मैंने दादाजी के नाम को बदनाम कर दिया। मुझे मर जाना चाहिए। माधुरी कहती है – मरने की बात क्यों करते हो बाबूजी। मुझे समाज की कोई परवाह नहीं है। मैं अब शादी अपने मन से करूंगी। एक माह में मेरा शादी हो जाएगी। रामवती, रामदास बहुत प्रसन्न हो जाते हैं। माधुरी को चन्द्रशेखर की नौकरी लगाने के लिए कहते हैं। उसी समय रायपुर पुलिस विभाग में आरक्षक की भर्ती शुरू हो जाती है। चन्द्रशेखर लाइन में खड़े होकर नापतौल करवाता है। माधुरी डी.जे. साहब से निवेदन कर पुलिस अधीक्षक रायपुर को फोन करा देती है। चन्द्रशेखर पुलिस विभाग में आरक्षक के पद पर प्रशिक्षण रायपुर माना केम्प में लेने लगता है। माधुरी भाई की नौकरी लगाकर निश्चिंत हो जाती है। रामवती और रामदास भी कुछ दिन वहां रहकर अपने गाँव वापस चले जाते हैं।

माधुरी अपना विवाह अपने साथी प्रथम श्रेणी के जज संजय सिंह ठाकुर से करने तैयार हो जाती है। दोनों एक-दूसरे के करीब आ जाते हैं। फिर विधिवत कलेक्टर के यहां आवेदन लगा देते हैं। एक माह बाद रामदास, रामवती, चन्द्रशेखर साक्ष्य बनकर कलेक्टर के समक्ष हस्ताक्षर कर देते हैं। कलेक्टर साहब माधुरी सिंह एवं संजय सिंह के विवाह की बधाई देते हैं। एक-दूसरे को फूल माला पहनाकर पति-पत्नी स्वीकार कर लेते हैं। संजय सिंह के पिताजी भी उपस्थित रहते हैं। संजय सिंह के पिताजी जबलपुर के नामी वकील थे। बेटे की खुशी में अपनी खुशी समझकर सहमत हो जाते हैं। वकील साहब आधुनिक विचारधारा के व्यक्ति थे। जाति-पाति में विश्वास नहीं करते थे।

मानवता को मानव का धर्म मानते थे। इंसानियत से बड़ी कोई चीज दुनिया में नहीं है। रामदास का रूद्रप्रताप सिंह समधी भेंट करता है। दोनों गले मिलकर खुशी का इजहार करते हैं। माधुरी, संजय सिंह, माँ, बाबू जी, पिताजी के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। कलेक्टर से विवाह का प्रमाण पत्र लेकर अपने निवास कलेक्ट्रेट के पीछे माधुरी के बंगले में आ जाते हैं।

संजय सिंह जज साहब दूसरे दिन रात्रि में शहर के गणमान्य नागरिकों, अधिकारियों, पत्रकारों, न्यायाधीशों को स्नेहभोज देते हैं। शहर के तमाम नेता, अधिकारी, कलेक्टर, कमिश्नर, डीआईजी, डीजे, पुलिस अधीक्षक लगभग पाँच हजार विशिष्ट व्यक्ति स्नेह भोज में आते हैं। वर-वधु को बधाई एवं शुभकामनाएं देते हैं। चन्द्रशेखर दौड़-दौड़कर लोगों को भोजन करा रहे थे। माधुरी एवं संजय की जोड़ी अच्छी जम रही थी। जितने लोगों ने देखा माधुरी की तारीफ करके गए।

रात्रि भोजन के बाद सुहागरात के लिए चन्द्रशेखर एक कमरे को सजा कर रखता है। माधुरी, संजय सुहागरात में दो शरीर एक जान हो जाते हैं। माधुरी व संजय सिंह प्रसन्न रहते हैं। संजय सिंह को पाकर माधुरी धन्य हो जाती है। घर में दोनों जज साहब, माधुरी और संजय का सुखी जीवन प्रारंभ होता है।

रामवती और रामदासकुछ दिन वहां रहने के बाद गाँव लौट जाते हैं। सभी मेहमान अपने-अपने निवास लौट जाते हैं। बच जाते हैं माधुरी एवं संजय सिंह। जीवन में परम आनन्द और सुख से रहने लगते हैं। भगवान का शुक्रिया अदा करते हैं। भगवान ने पैदा किया है तो वह जोड़ी अवश्य बनाता है।

प्रस्तुतिः जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़


भाग- चौदह


केन्द्रीय जेल रायपुर में रामदास की अच्छी चलती थी। सभी अधिकारी जान पहचान वाले मिल जाते हैं। रामदास का विभाग द्वारा उपनिरीक्षक पद पर पदोन्नति कर दिया गया था। परंतु जेल में बंद होने के कारण पदोन्नति का फल नहीं मिल पाया। इसलिए जेलर लोग दरोगा साहब कहकर इज्जत देते थे। कैदियों में भी दरोगा साहब के नाम से प्रसिद्ध थे। रामदास का जेल भर में अच्छा दबदबा था। खूंखार कैदी भी रामदास के नाम से डर जाते थे। जेल अधीक्षक के.के. गुप्ता साहब जब कोई उत्पात होता था तो रामदास व साथियों ही बुला लेता था। उस कैदी की मरम्मत करा देता था। एक बार किसी कैदी को रामदास का थप्पड़ पड़ जाता तो जिंदगी भर याद रखता था। इसलिए पूरी जेल में अमन चैन बना रहता था। रामदास को अच्छा भोजन, दूध, फल, डबल रोटी सभी चीजें खाने को मिल जाती थी। इसलिए रामदास का शरीर मोटा हो गया था व लाल रंग का गोरा, नाटा हट्टा-कट्टा जवान दिखता था। दो आदमी रामदास से भिड़ नहीं सकते थए। फिर पुलिस विभाग का सर्वोत्तम आरक्षक ठहरा। सभी क्षेत्रों में रामदास प्रज्ञावान, अति प्रख्यात। केन्द्रीय जेल में रामदास जोगी का कैदी नंबर 1985 था। सुबह चार बजे उठकर शौच से निपट कर जेल के भीतर वह दस चक्कर दौड़ता था। सभी कैदियों को योगाभ्यास कराता था। बिना नागा किए सभी कैदी अपने स्वास्थ् के प्रति सजग थे। सायं काल भजन कीर्तन कराता था। सारे कैदी नियति मानकर चल रहे थे। देश दुनिया की फिक्र त्यागकर योगाभ्यास, भजन कीर्तन रामदास के मार्गदर्शन में करते थे। रामदास जेल अधिकारियों के आधे काम स्वयं कर देता था। सभी उसके कामकाज से खुश थे। सुबह से शाम तक रामदास व्यस्त रहता। कोई भी अधिकारी जेल में निरीक्षण करने आता, रामदास ही चक्कर लगाकर पूरा जेल द्खाता था। केन्द्रीय जेल में बढ़ई, कपड़ा, वूलन, दर्जी, सिलाई, कढ़ाई,पेंटिंग के छोटे-मोटे काम कारखाने थे। कैदियों को कार्य सिखाया जाता था। जेल में निवाड़, कपड़े बनाने का धंधा चलता था। बहुत बढ़िया उत्पादन होता था। रामदास निवाड़ बुनने का कार्य सीख गया था। अन्य कैदियों को निवाड़ बुनने के लिए वह प्रशिक्षण दे रहा था। प्रति वर्ष इस यूनिट से जेल विभाग को पचास लाख से अधिक का फायदा होता था। हर कार्य में रामदास प्रवीण था। माधुरी अपनी माँ रामवती के साथ रायपुर जाकर रामदास से भेंट करती है। रामवती को माधुरी के विवाह की चिंता सता रही थी। गाँव में कई लोग उसे देखने के लिए आए थे। परंतु पिता के जेल में होने के कारण शादी करने से इंकार कर दिया था। एक प्रकार से वे समाज से बहिष्कृत हो गए थे। सामाजिक बहिष्कार होने से संबंध नहीं बन पा रहा था। रामवती बहुत दुखी थी। रामवती ने मजदूरी करके माधुरी को पढ़ाया था। अब माधुरी शादी नहीं करने का भी संकल्प ले लेती है। माधुरी मामा के गाँव सेंदरी से आकर वकालत किया करती थी। माधुरी अपना खर्चा वकालत से चला रही थी। वह अपने भाई चन्द्रशेखर को मिशन स्कूल में कक्षा आठवीं में पढ़ा रही थी। चन्द्रशेखर हॉस्टल में रहकर पढ़ रहा थआ। माधुरी वरिष्ठ वकीलों से अच्छा संबंध बनाकर ज्ञान अर्जित कर रही थी। माधुरी को वकालत करते दो वर्ष हो गए थे। माधुरी सिविल जज की परीक्षा देती है। एक ही बार में परीक्षा उत्तीर्ण कर सिविल जज बन जाती है। माधुरी सिविल जज की प्रथम पोस्टिंग रायगढ़ में होती है। माधुरी रायगढ़ जाकर उपस्थिति रिपोर्ट देती है। डी.जे. साहब बहुत खुश होते हैं कि छत्तीसगढ़ की कोई महिला पहली जज बनकर आई है। डी.जे. साहब माधुरी को प्रशिक्षण सभी न्यायालयों में एक-एक करके तीन माह तक देते हैं। इसके बाद प्रशासनिक प्रशिक्षण के लिए वह जबलपुर चली जाती है। रामदास से भेंट करने रामवती, चन्द्रशेखर, शांति रायपुर जेल जाते हैं। वहां रामवती बताती है कि माधुरी के विवाह के लिए कई संबंध आए, परन्तु पिता जेल में होने से शादी तय नहीं हो पाई। हमारा सामाजिक बहिष्कार हो गया है। रामदास कहता है कि जो हुआ अच्छा हुआ। आज शादी न होने के कारण ही तो माधुरी जज बन गई है। शादी हो जाती तो क्या गाँव में रहकर वह गोबर उठाती रहती। रामदास की आँखों में खुशी के आंसू आ जाते हैं। रामवती भी रो पड़ती है। रामदास सारा श्रेय रामवती को देता है। मेरे सपने को पूरा कर दिया। बेटी-बेटा एवं मेरी माँ को खेतों में काम करके, दूसरे खेतों में मजदूरी करके पढ़ाया-लिखाया, पालन-पोषण किया। तुम धन्य हो रामवती। तुम्हारे जैसी पत्नी सभी इंसानों को मिले। तुमने माँ को अपनी माँ मान कर सेवा की है, मेरे घर को आबाद रखा है। धन्य है सतनाम साहब, जय गुरूदेव, जय सतनाम। रामदास के आंसू झरने के समान झर-झर बहने लगते हैं। जेलर साहब देखकर रो पड़ते हैं। सभी कैदियों को सतमार्ग पर चलने के लिए उपदेश देने के बाद रामदास आज रो रहा है। जेलर साहब रंजनसिंह बंजारे से अपने परिवार की भेंट कराते हैं। रामदास बताता है – सर, मेरी बड़ी पुत्री माधुरी रायगढ़ में सिविल जज बन गई है। जेलर साहब बहुत खुश होते हैं। रामदास से भेंटकर अंदर चले जाते हैं। रामवती बस से बिलासपुर आ जाती है। फिर बस द्वारा अपने गाँव आ जाती है। माधुरी के जज बनने के खुशी में रामवती रात में मंगल चौक, आरती का कार्यक्रम कराती है। गाँव में मिठाई बांटी जाती है। माधुरी समाज की पहली महिला जज बनी थी। रात भर मंगल चौक में गीत का आयोजन होता है। सभी लोगों के भोजन करने के बाद कार्यक्रम शुरू होता है और सुबह पाँच बजे तक चलता रहता है। रामवती पान, प्रसाद, नारियल चढ़ाती है। चौका पार्टी को दो सौ इक्यावन रुपए भेंट मेंदेते हैं। सभी लोग खुशी-खुशी अपने घर चले जाते हैं। रामवती का दुख समाप्त नहीं होता है। गाँव के बदमाश लोग रात में घर आ जाते हैं। घर में कोई पुरुष सदस्य नहीं होने से गलत नीयत से आ जाते थे। शांतिबाई लाठी लेकर दरवाजे में सोती थी। किसी को फटकने नहीं देती थी। रामवती सुरक्षित थी। शांतिबाई बेटी के समान बहू को रख रही थी। रामवती अपनी माँ से बढ़कर सास को चाहती थी। रामवती पतिव्रता नारी थी। गाँव में अकेली महिला किसी प्रकार की घटना न हो जाए। बिलासपुर जिला अस्पताल जाकर नसबंदी करा ली थी। रामवती जानती थी कि कुछ ऊंच-नीच हो जाए तो कहीं की नहीं रहूंगी। रामवती पुरुषों के जाल में नहीं फंस रही थी। सभी रामवती के गदराए शरीर को एकटक देखते रहते थे। बड़ी सावधानी से उसने खुद को बचा रखा था। नहीं तो न जाने कौन सूने घर में घुस जाए। माधुरी उच्च न्यायालय जबलपुर से प्रशिक्षण प्राप्त कर रायगढ़ आ जाती है। माधुरी को चक्रधर नगर में एक बंगला मिल जाता है। माधुरी को अच्छा प्रशिक्षण मिल रहा है। डी.जे. साहब रायगढ़ थाना भेजने के लिए न्यायाधीश के कार्यक्षेत्र आबंटित कर देते हैं। माधुरी मन लगाकर कार्य करती है। रामवती, शांति एवं चन्द्रशेखर को अपने पास ही बुला लेती है। चन्द्रशेखर परीक्षा के बाद रायगढ़ में रहता है। रामवती कभी-कभी गाँव की देखरेख के लिए आती जाती थी। रामवती के सुख के दिन आ गए थे। माँ दादी की खूब सेवा करत थी। रामवती बेटी को घर का कोई काम नहीं करने देती थी। रामवती की मेहनत रंग लाई थी। रोजी मजदूरी कर बच्चों को पढ़ाई थी। कितना कष्ट सहकर बड़ा किया था। माधुरी जज बनकर समाज में नाम कमा रही थी। शहर के तमाम गुंडे बदमाशों सख्त से सख्त सजा सुना रही थी। अपराधियों को अधिक से अधिक सजा एवं निरपराधियों को छोड़ देती थी। इसलिए माधुरी अपने पद पर न्यायप्रिय और ईमानदास मानी जाती थी। बहुत ही अच्छा निर्णय भी देती थी। डी.जे. साहब माधुरी के निर्णयों को अन्य जजों को पढ़कर सुनाया करते थे। नजीर के रूप में प्रस्तुत करते थे। रामवती के साथ माधुरी केन्द्रीय जेल रायपुर रामदास से मुलाकात करने जाती है। माधुरी जज का परिचय देने से जेलर साहब सम्मान के साथ अपने कक्ष में ले जाकर बैठाता है। रंजनसिंह बंजारे जेल में रामदास को बुलाने के लिए एक सिपाही भेज देता है। रामदास बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ आता है। माधुरी और रामवती उसके चरण छूकर प्रणाम करते हैं। रामदास की आँखों से आंसू गिरने लगते हैं। माधुरी और रामवती भी रोने लगते हैं। जेलर साहब घर से चाय मंगाकर पिलाते हैं। रामदास जेलर साहब से कहता है – सर, रामवती की मेहनत का फल है कि माधुरी जज बन पाई है। मजदूरी करके पढ़ाई है। काश, मैं आज बाहर होता। कितनी खुशी होती मुझे। मूछों में ताव देकर चलता। मेरी छोटी सी भूल के कारण मेरा सुखी परिवार उजड़ गया था। मैं आज डीएसपी पद पर पदोन्नत हो गया होता। जबकि मेरे साथी बन गए हं। मुझे अपने किए पर पछतावा है। मेरी जिंदगी बर्बाद हो गई है। आजजेल ही मेरा घर बन गया है। माधुरी रामदास से दिनचर्या के बारे में पूछती है। रामवती माधुरी के विवाह के संबंध में बताती है। कई लोग देखने आए। पसन्द किए। परन्तु लौटकर कोई नहीं आया। सामाजिक बहिष्कार कर दिया है। हमारी माधुरी कहती है कि माँ मेरी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। माँ बेटा बनकर घर परिवार चलाऊंगी। यदि मुझे कोई योग्य वर जातीय न भी मिले, तो विजातीय से विवाह कर लूंगी। रामदास कहता है – बेटी जो मर्जी में आए अपने मनपसंद का कर लेना। समाज में क्या धरा है ? समाज ने क्या दिया है, उल्टे ताना। दादाजी के समय में सभी हमारे घर में आते थे। पचासों लोग प्रतिदिन भोजन करते थे। रामवती खाना बनाने में परेशान रहती थी। घर में नौकर चाकरों की कोई कमी नहीं थी। लगभग एक घंटे तक चर्चा चलती रही। रामदास फिर चन्द्रशेखर के बारे में पूछता है। चन्द्रशेखर ने मेट्रिक की परीक्षा दी थी। पर रिजल्ट नहीं आया था। रामदास उसे देखने के लिए तरसता है। माधुरी जेलर साहब को पेरोल पर पन्द्रह दिनों के लिए अवकाश हेतु आवेदन करती है। जेलर साहब अधीक्षक को भेज देता है। माधुरी रामवती कुछ उपहार सौंपकर ट्रेन से रायगढ़ चली जाती है। रामदास खुशी के मारे मिठाई के डिब्बे को बैरक भर के केदियों को बांटता है। मेरी बेटी जज साहब बन गई है। मेरा सपना था कि मेरी बेटी जज बन कर समाज में नाम कमाए। सभी कैदी रामदास को बधाई देते हैं। रामदास उस रात निश्चिंत होकर मूछों ऊपर तान कर सोता है। दूसरे दिन सुबह योगाभ्यास के समय सभी कैदियों को छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण हेतु संकल्प कराता है। सभी जय छत्तीसगढ़ का नारा लगाते हैं। जेल परिसर में जय छत्तीसगढ़ का नारा गूंज उठता है। जय छत्तीसगढ़ तेरी जय हो। रामदास मंच पर जाकर भाषण देता है। जेल में राज्य निर्माण हेतु बिगुल फूंका जाता है।

भाग- तेरह


केन्द्रीय जेल में रामदास विचाराधीन कैदी के रूप में रह रहा था। रामदासको शुरू में कुछ अटपटा लग रहा था। परंतु नियति मानकर सब कुछ सहकर दिन काटने लगता है। ट्रायल कोर्ट में गवाही, साक्ष्यों का बयान होता है। हत्या के बयान दर्ज किए जाते हैं। सभी साक्ष्यों के बयान लेने में करीब सात महीने लग जाते हैं। समरी ट्रायल के बाद सेशन में प्रकरण ट्रांसफर हो जाता है। रामदास से मिलने रामवती, माधुरी,शांति, झालर आते हैं। मर्डर केस में वकील पचास हजार रुपयों की मांग करता है। झालर पाँच एकड़ खेत में तीन एकड़ बेचकर रामदास तो बचाने के लिए वकील रखता है। तृतीय अतिरिक्त एवं सेशन जज ने पहली पेशी में पूरे प्रकरण को देखा। दूसरी पेशी में हत्या के जुर्म व अपराध सिद्ध होन एवं हत्या का जुर्म कबूल लेने के कारण आजीवन कारावास की सजा सुना देते हैं। रामवती, शांति, माधुरी, झालर बहुत रोते हैं। रामदास को बहुत अफसोस होता है कि मेरे कारण खेत भी बिक गए। अब जीवन के लिए मात्र दो एकड़ खेत बचा है। रामवती और बच्चों के पालन-पोषण, पढ़ाने-लिखाने के लिए ध्यान देने के लिए जवाबदार कौन होगा। रामवती सब के साथ घर लौट जाती है। पहाड़ जैसी जिंदगी एवं बच्चों के भविष्य का क्या होगा ? वह भारी चिंतित हो जाती है। उस दिन तो घर में चूल्हा भी नहीं जलता। मनमोहन अपने घर से भोजन लाकर बच्चों को खिलाता है।

दूसरे दिन सुबह ज्यों ही झालरदास खटिया से उठता है जमीन पर पैर रखते ही चक्कर खाकर गिर जाता है। बेटे को सजा होने का जबरदस्त झटका लगता है, ब्रेन हेमरेज हो जाता है। उसके तुरंत प्राण-पखेरु उड़ जाते हैं। बेटे के गम में झालर मर जाता है। घर में रोना-चिल्लाना शुरू हो जाता है। एक बेटे का गम और दूसरा पति की मृत्यु, शांति बहुत रोती है। भगवान क्या-क्या सहन करें। दहाड़ मारक वह होती है और अचेत हो जाती है। माधुरी चन्दू को गोद लिए रोती फिर रही थी। दादी को समझा भी रही थी। रामवती की आँखें सूज गई थी। उधर मनमोहन खाट से लाश को नीचे उतार कर जमीन मेंरख देता है। नए कपड़ों, सफेद धोती से ढंक देता है। जगतारण पास में बैठकर अगरबत्ती जलाकर रख देता है। गाँव के सभी लोग घर में आकर अंतिम दर्शन करते हैं। महिलाएं शांति को समझाती हैं मत रोओ। शांति दहाड़ मारकर रोती है। सुनने वालों की आँखें भी नम हो जाती हैं। उधर बेटे को आजीवन कारावस की सजा। इधर पति की मृत्यु। दुख का पहाड़ टूट पड़ता है। बेटा एक बूंद पानी बाप के मुख में नहीं डाल पाया, न ही क्रियाकर्म में भाग ले पाया। गाँव वाले मिलकर झालरदास को मुक्तिधाम में दफना देते हैं। वहीं मणिदास के मठ के पास।

झालरदास की मिट्टी में सैकड़ों आदमी आते हैं। मरघट से तालाब में आकर स्नान करके अपने-अपने घर चले जाते हैं। मनमोहन सबी को दरवाजे पर हाथ जोड़े नमस्कार करता है। मेहमान शाम को अपने घर लौट जाते हैं। दूसरे दिन मनमोहन रामदास से भेंट करने जेल जाता है। चाचाजी की मृत्यु के बारे में बतात है। रामदास खूब रोता है। जेलर साहब समझाते हैं, मगर रामदास का मन नहीं मानता, रोते-रोते अपने बैरक में चला जाता है। मनमोहन भेंट करके गांव आ जाता है। झालरदास के दस दिन में दशकर्म करते हैं। कुछ लोगों को भोजन कराना चाहता है। परंतु गाँव वाले भोजन करने से इंकार कर देते हैं। वे हत्यारों के घर में भोजन करना नहीं चाहते, सामाजिक बहिष्कार जो कर रखा है। जगतारण व मनमोहन समाज के लोगों से काफी अनुनय विनय करते हैं। परंतु वे नहीं पिघलते। किसी प्रकार से आए मेहमानों द्वारा नारियल पूजा कराके दशकर्म निबटाते हैं। परिवार पर दुख के बादल छा जाते हैं। उधर रामवती, माधुरी और शांति सोचती हैं कि हम लोगों ने तो कोई अपराध नहीं किया जिसने अपराध किया उसको सजा भी मिल गई है। वह जेल में रह रहा है। किसी प्रकार दशकर्म निपट जाता है।

रामदास बैरक में जाकर बहुत रोता है। खाना-पीना बंद कर देता है। बैरक के सभी कैदी समझाते हैं। जेल में आसपास गाँव बिनेका, बिनौरी, जुनवानी, थेम्हापार के सजायाफ्ता सभी गाँव में एक-एक हत्या करके आजीवन सजा पाए कैदी रहते हैं। बहुत समझाते हैं। रामदास कहता है – मेरी छोटी सी भूल से मेरा हंसता खेलता परिवार तबाह हो गया। मेरे बाप-दादा का जो नाम था वह मिट्टी में मिल गया। रामदास धीरे-धीरे सामान्य हो जाता है। कुछ दिनों बाद रामवती भी मुलाकात के लिए आती है। रामदास उससे सब हाल सुनता है। रामदास चन्द्रशेखर को हाथ से छूता है। रामवती बहुत रोती है। मैं कैसे बच्चों को पालूंगी। पढाउंगी-लिखाउंगी। रामदास कहता है – तुम अभी जवान हो। दूसरा विवाह कर लो। मेरी तरफ से आजाद हो। मैं तो अब जेल में ही सड़ूंगा। जेल से छूटूंगा तो मेरी उम्र पचास साल हो जाएगी। बूढ़ा होकर निकलूंगा। रामवती खूबरोती है। मैं तो चली जाऊंगी पर माधुरी व चन्दू का क्या होगा ? भगवान ने पैदा किया है वही सब बिगड़ी बनाएगा। माँ कैसी है ? रामवती बोलती है आशा नहीं दिखाई पड़ती भला कितने दिन साथ देंगी। रामदास समझाकर रामवती को चन्दू और माधुरी धीरज रखने को कहता है। रामवती अपने मायके में कुछ दिन के लिए चली जाती है। वहां भाई भाभी लोगताना मारते हैं। रामवती दो दिन रहकर अपने गाँव आ जाती है। गाँव में खेती किसानी मजदूरी करने लगती है। गाँव की महिलाएं अपने साथ निंदाई, कटाई, मिंजाई के कार्य के लिए ले जाती हैं। रामवती अपना एवं बच्चों का पेट भरने लगती है। माधुरी बिलासपुर में हॉस्टल में रहकर मेट्रिक में प्रथम श्रेणी में पास होती है। माधुरी पढ़ने में होशियार थी। रामवती कभी-कभी बेटी को देखने हॉस्टल चली जाती थी। इस प्रकार माधुरी बी.ए. पास हो जाती है। माँ मजदूरी करके बेटी को पढ़ाती है। माधुरी दो वर्ष बाद इतिहास में एम.ए. पास करती है। रामवती बेटी की खुशी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर रही थी। माधुरी भी लगन और मेहनत करके पढ़ती है। एमए के बाद एलएलबी भी पास कर लेती है। माधुरी बोलने में होशियार थी। कानून का अच्छा ज्ञान भी प्राप्त कर लिया था। वरिष्ठ अधिवक्ता काला कोट पहनकर कोर्ट जाती थी। देखने वाले देखते रह जाते हैं। माधुरी खूबसूरत लड़की थी। मुसकरा कर सभी से बातें करती थी। आवाज बड़ी मधुर थी।

रामदास जेल में सादा जीवन व्यतीत कर रहा था। रामदास के पुराने दुश्मन दर्शन सिंह को सात साल की कैद हो जाती है। बिलासपुर जेल में भेंट हो जाती है। रामदास से बदले की भावना से चार-पाँच कैदियों को साथ लेकर हमला कर देता है। और उसे मार मार कर अधमरा कर देता है। रामदास उस दिन तो कुछ नहीं बोलता। दूसरे दिन भोजन के समय मौका पाकर रामदास दस साथियों सहित दर्शन सिंह पर हमला बोल देता है। इतना मारता है कि दर्शन सिंह के हाथ पैर टूट जाते हैं। जेल में हड़कम्प मच जाता है। जेलर साहब आकर हवाई फायर कर माहौल को शांत करते हैं। रामदास कहता है – सर, कल ये लोग मेरे साथ मारपीट किए थे। उसका बदला मैंने आज ले लिया। जेल अधीक्षक जेल के भीतर मारपीट से परेशान होकर रामदास व साथियों को केन्द्रीय जेल रायपुर में ट्रांसफर करा देता है। रामदास रायपुर जेल में अच्छे चाल चलन से रहता है। अच्छे चाल चलन के कारण जेलस श्री रंजन सिंह बंजारे उसे बहुत चाहते हैं। रामदास को भोजन व्यवस्था का इंचार्ज बना देते हैं। रामदास का सभी जेल अधिकारियों से अच्छा संबंध रहता है। खुशी से रामदास का जीवन बीतने लगा। रामदास बिलासपुर जेल रायपुर जेल में जाने से जेल परिसर में शांति स्थापित हो जाती है। मगर दर्शन सिंह का वहां एकछत्र राज हो जाता है।

भाग-बारह


रामदास की कुल जमा तेरह साल की सेव अवधि थी। इस तरह तेरह साल में दो पदोन्नति हो चुकी थी। सहायक निरीक्षक से उप निरीक्षक बनने के लिए 6 माह का और समय था। रामदास का कार्य एवं गोपनीय चरित्रावली बहुत अच्छी रहती है। उत्कृष्ट श्रेणी होने के कारण पदोन्नति समिती द्वारा विचार क्षेत्र में लिया जाता है। पदोन्नति के योग्य पाया जाता है। रामदास थाने में बैठा कार्य निपटा रहा था। मनमोहन गाँव से कोरबा थाने पहुंचता है। भइया के चरण छूता है। रामदास पूछता है कि गाँव में चुगली-चारी, जुआ चित्ती, दारू मंद पीकर सब कोई बिगड़ गए हैं। एकदूसरे को नीचा दिखाने के लिए झूठमूठ के झगड़े लड़ाई में फंसा देते हैं। गाँव अब रहने लायक नहीं रह गया है। परंतु गाँव में पुश्तैनी घर, खेत, सम्पत्ति है। छोड़कर कहां जाए ? आपने अच्छा किया कि पुलिस विभाग की नौकरी में आ गए। मन मोहन बताता है – चाचा जी की तबीयत कुछ दिनों से खराब है। खाना-पीना बंद हो गया है। इसलिए आया हूं। स्कूलों में गर्मियों की छुट्टियां हो गई है। चाचा ने बच्चों को गांव बुलाया है। वे बच्चों को देखना चाहते हैं। रामदास थाना से निकलकर घर आता है और रामवती को बताता है। रामवती कहती है एक माह की छुट्टी ले लो। पिताजी की बीमारी के कारण अवकाश मिल जाएगा।

रामदास अर्जित अवकाश का फार्म भरकर कतलम साहब को दे देता है। कतलम साहब पिताजी की बीमारी का कारण जानकर अनुशंसा कर देता है और अवकास में जाने के लिए रवाना कर देता है। रामदास बच्चों सहित जीप में गाँव आ जाता है। रामदास को देखकर माँ भी खुश हो जाती है। रामवती, माधुरी, रामदास तीनों माँ के चरण छूकर प्रणाम करते हैं। चन्द्रशेखर को गोदी में लेकर चूमने लगती है। झालरदास परछी के खटिया में खोक, खोक कर रहा था। लेटा हुआ था। उठने की हिम्मत नहीं थी। रामदास, रामवती चरण छूकर प्रणाम करते हैं। वह पैर में हाथ लगने से जाग जाता है। कहता है – बेटा अच्छा हुआ आ गए। मैं तो कब मर जाऊं, भरोसा नहीं। माधुरी दादाजी के पास बैठकर प्रणाम करती है। शांति बाई चन्दू को लेकर पहुंच जाती है। रामदास पिताजी को सांत्वना देता है कि सब ठीक हो जाएगा। मस्तूरी से डॉक्टर बुलाऊंगा। डॉ. गुप्ता बढ़िया इलाज करता है। झालर दास कहता है – नहीं बेटा, अब मेरा जाने का समय आ गया है। खर्च मत करना। चन्दू को देखता है। झालरदास कहता है कि – बिल्कुल मेरे पिताजी के ऊपर गया है। चारों तरफ देखकर सोने का प्रयास करता है। शांति दवाई लाती है। रामवती, रामदास दोनों पकड़कर गोली को खिलाते हैं। गोली खाने से नींद आ जाती है। रामदास रामवती कपड़े बदलने अपने कमरे में चले जाते हैं।

रामवती रसोई में जाकर भोजन बनाती है। सब मिलकर परछी में बैठकर भोजन करते हैं। माधुरी को गाँव की सब्जी, दाल, भात बहुत अच्छा लगता है। दादी माधुरी के लिए पुराना अचार आम, नींबू के निकालती है। माधुरी चटकारे लेकर आम के अचार को काती है। चन्दू को भी दाल भात खिलाती है। भोजन करके रामदास सो जाते हैं। राउत, केवट पास पास के घरों के पास से मुर्गा बांगने की आवाज आती है – कुकडुकूं-कुकडूकूं। रामदास की नींद उचट जाती है। रामवती कहती है – आज तो सो जाओ, ड्यूटी में नहीं जाना है। यहां शांति से तो उठो। रामदास सुनकर सोने का प्रयास करता है परंतु नींद नहीं आती। प्रातः उठकर रामदास लोटा में पानी लेकर नहर पार की ओर चला जाता है। दो किलोमीटर पैदल चलकर शौच के लिए जाता है। शौच से निपटकर तालाब के घाट में आ जाता है। तालाब का दृश्य देखकर अवाक रह जाता है। तालाब में कोई कमल का फूल पत्ती न चिड़ियों कलरव। तालाब के चारों ओर की अमराई को देखता है। सभी वीराना। सभी मीठे आक के पेड़ों को दुष्ट जमींदार ने रहने नहीं दिया था, बल्कि उसे खेत में बदल दिया था। सौ से दो सौ वर्षों के पेड़ों को कटवा दिया था। सभी खाली-खाली दिख रहा था। तालाब के उस पार जमींदार ने एक झोंपड़ी बनवा ली थी। घाट के सामने झोंपड़ी, पशुओं के लिए मकान। अच्छा नहीं लग रहा था। अब वह रामदास के सपनों का आदर्श गाँव नहीं था। बहुत परिवर्तन हो गया था। गाँव एकदम परायालगने लगा था। घाट में रामदास कुछ सोच रहा था। तालाब में नहाने के लिए उतरापर जरा भी मन नहीं लगा। तालाब का पानी मछली मारने के कारण गंदा हो गया था। मछली ठेकेदार जाल डालकर मछली मार लेता था। पानी एकदम खराब हो गया। रामदास का मन खिन्न हो जाता है। कैसं गाँव का विकास हो। सोचने लगता है। ग्राम पंचायत का सरपंच भी खाने पीने में मस्त था। गाँव के विकास से उसे कोई मतलब नहीं था। पूरन और मनमोहन घाट में आ जाते हैं। पूरन दरोगासाहब को नमस्कार करता है। रामदास हाथ मिलाकरबात करताहै। रामदास बदलावों के बारे में पूछता है। वह रामदास को गनी अमराई के ठण्डी जुड़ छांव के उजड़ जाने की सारी कहानी बताता है। तालाब के चारों ओर मीठे-मीठे आम के बड़े-बड़े पेड़ किसी पुण्यात्मा ने ही लगाए थे। जमींदार ने उस सार्वजनिक जमीन को अपने नाम पटवारी अभिलेख में रुपए देकर चढ़वा लिया। फर्जी दस्तावेज के आधार पर पटवारी ने नाम दर्ज कर दिया। गाँव वालों ने बहुत विरोध किया। परंतु उसने बांदा से लठिया मैनेजर रखकर अमराई को काट डाला। जमीन किसानों को बेच दिया। रामदास सुनकर दंग रह जाता है। साले लोग सारी भूमि बेचकर अपनी तिजोरी भर लिए। और अब गाँव छोड़कर भाग गए। रामदास और मनमोहन स्नान कर घर आ जाते हैं। रामवती और माधुरी चाय पीकर रामदास का इंतजार कर रहे थे। रामदास को पीने के लिए गाय का एक गिलास दूध दिया। साथ में चीला रोटी ती, धनिया, मिर्च-लहसुन, टमाटर की चटनी परोसी। बहुत स्वादिष्ट लग रहा था। बहुत दिनों के बाद चीला रोटी खाया था। दूबराज के चावल की सुगंध से ही आधा पेट भर गया था। रामदास गरम-गरम रोटी खा रहा था। रामवती रोटी पका रही थी। सुबह का नाश्ता हो गया था। चन्दू को भी एक दो कौर रोटी खिलाया कपड़ पहनाकर परछी में बैठा दिया, तभी चार सयाने वृद्ध लोग आ जाते हैं। रामदास सभी को नमस्कारकरता है। एक वृद्ध मुनकूराम पूछता है – बेटा कहां रहते हो ? रामदास ने बताया – दादाजी, आजकल कोरबा में रहता हूँ। पिताजी की बीमारी के कारण एक महीने की छुट्टी लेकर आया हूँ। मुनकूराम – अच्छा-अच्छा। झालर बहुत अच्छा आदमी है। बेटा ठीक से इलाज करवा दे। पिता केरहने से घर द्वार ठीक रहता है। कम से कम चौकीदारी तो करता है। रामदास कहता है – मैं तो उन्हें कोरबा बुलाया था। माँ-पिताजी को अपने साथ रखने के लिए बोला था। झालरदास कहता है - कुछ दिन रहने के बाद बोरियत महसूस करने लगा। फिर कुछ दिन के बाद गाँव आया हूँ। मैं क्या करूं ? गाँव का मोह नहीं छूटता। फिर गाँव में खेती किसानी है। गाँव का मान सम्मान वहां कहां मिलेगा। इसलिए गाँव आ गया। झालर महंत अब धीरे-धीरे ठीक होने लगता है। सात दिन में पूर्ण स्वस्थ होकर बाहर-भीतर चल लेता है। गाँव के लफंगे बदमाश लड़के लोग दारू पीकर हुल्लड़ करते दरवाजे के पास आकर गाली बकने लगते हैं। आपस में झगड़ने लगते हैं। गाँव में जुआ का जोर था। आसपास के लोग जुआ खेलने आते हैं। जीतने वाले से दारू के पैसे लेकर पीते थे। गाँव में सूदखोरी बढ़ गई थी। कई किसान के लड़के उधर जुए में हार गए थे। सूदखोर लोग एक हजार रुपए के आठ दिन में पन्दह सौ लेते थे। आठ दिन में नहीं चुकाने पर चवन्नी ब्याज लगाते थे। दो महीने में पाँच हजार रुपए हो जाता था। दस हजार रुपए का तीन माह में तीस हजार रुपए लेता था। कई किसान अपनी जमीन बेचकर कर्ज को चुकाता था। कई किसान भूमिहीन हो गए थे। गाँव में चोरी बढ़ गई थी। सूने मकानों में से धान, बर्तन-भांडे, गहने चुराकर जुआ खेलते थे। गाँव में अभी भी ताले नहीं लगाते थे। परन्तु चोरी के डर स ताला लगाने लगे हैं।जो सम्पन्न किसान थे, उनके दरवाजों में ताला लगा रहता था। छोटे किसान एवं मजदूरों के यहां ताला नहीं लगाते थे। बड़े विश्वास से एक दूसरे की मदद करते थे। कुछ वर्षों से शहर की आबोहवा सिनेमा देखकर बिगड़ गए थे। रामदास गाँव में न रहकर कभी बिलासपुर, कभी मस्तूरी, कभी सेंदरी जाकर समय बिता रहा था। रामवती, माधुरी भी गाँव में ऊब रहे थे। माधुरी कक्षा नवमी की पुस्तक ले आई थी। बेठे-बैठे पढ़ती रहती थी। आसपास के सम्पन्न किसानों को पता जलता है कि जोगी दरोगा साहब के यहां शादी योग्य लड़की है, देखने के लिए आते। रामदास ने रामवती से कहाकि माधुरी को पढ़ा-लिखा कर जज साहब बनाएंगे। इधर माधुरी भी शादी नहीं करना चाहती थी। परछी में बैठकर रामवती माधुरी के सिर में जुए निकाल रही थी। गाँव के तालाब में नहाने से माधुरी के सिर के बालों में जुए अधिक भर गए थे। उसके लंबे-लंबे केश थे। कमर तक आ गए थे। मादुरी दोनो वेणी में लाल फीते बांधकर चलती थी। तितली के समान उड़ती चलती थी। बहुत सुन्दर, गोरी रंगत, पाँच फीट ऊंचाई। देखने वाले एक ही नजर में उसे पसंद कर लेते थे। माधुरी को माहवारी भी शुरू हो गई थी। इसलिए रामवती विवाह करवाना चाहती थी। कुछ ऊंच-नीच न हो जाए। हर माँ अपनी पुत्री को विवाह करके सुखी जीवन की कामना करती है। परन्तु रामदास माधुरी को जज बनाना चाहता था। माधुरी भी पढ़ना चाहती थी। रामवती पढ़ी-लिखी थी। इसलिए लड़की को गाँव में नहीं देना चाहती थी। एक माह का अवकाश अच्छे ढंग से बीत रहा था। आब मात्र चार दिन बाकी थे। मनमोहन जुए में पचास हजार रुपए हार गया था। रोजाना चार-पाँच लोग गाली गलौज कर रहे थे। धमकी भी दे रहे थे। मनमोहन रामदास के बड़े पिताजी का लड़का था। उसके घर का दरवाजा आमने-सामने था। रामदास को बहुत बुरा लग रहा था। परन्तु क्या करता ? मनमोहन को समझाया कि तुम उधार इन लोगों से क्यों लिए ? दूसरे दिन सामलदास नामक बदमाश लठैत, चार लठैत लेकर, दारू पीकर गाली गलौज करने लगा। माँ-बहन कीगाली देने लगे। मनमोहन चुपचाप सुन रहा था। मनमोहन को गर से निकाल कर फिर लाठियों से पीटने लगे, तब रामदास ने मना किया। परंतु दारू के नशे में वे रामदास को ही पीटने लगे। रोकने बचाने पर वे भाग गए। रामदास गुस्से में आगबबूला हो गया। आँखें लाल हो गईं। वह गुस्से में कांपने लगा। रामवती रोककर बोली – तुम्हें क्या करना है ? रामदास क्रोध में पागल हो गया। घर से एक हाथ में लाठी, दूसरे हाथ में तलवार लेकर निकल पड़ा। रामवती गली तक पीछे-पीछे दौड़ती रही परन्तु रामदास दौड़ते हुए दूर जा चुका था। उधर रामदास ललकरता है कि रुको सालों, मुझे मारे हो। मैं दैख लूंग। सामलदास भागने लगता है। कुछ दूरी पर रामदास उसे पकड़ लेता है। सामलदास एवं रामदास में झूमा झटकी होती है। लाठियों से वे एक दूसरे पर वार करते हैं। रामदास घायल हो जाता है। रामदास क्रोध से आगबबूला हो जाता है। तलवार की मूठ पकड़कर एक वार गले पर करता है। सामलदास का गला कटकर अलग हो जाता है। कटा धड़ और सिर तड़पने लगता है। वहां पर खून की धार पहने लगती है। रामदास के कपड़ों में खून के धब्बे लग जाते हैं। रामदास नंगी तलवार खून से सनी लेकर गाँव में घूमने लगता है। रामदास पागलों की तरह हरकत करने लगता है। सामलदास को मार डाला कहकर जोर से अट्टहास करने लगता है। गाँव वाले सभी अपने दरवाजे बंद कर लेते हैं। सामलदास की हत्या हो जाती है। रामदास घर जाता है। रामवती से पानी मांगता है। रामवती बहुत रोती है। माधुरी, शांति, झालरदास भी रोने लगते हैं। यह तूने क्या किया बेटा ? एक मरे हुए को मारकर हत्या का अपराध कर डाला तूने ? जरा चन्दू की ओर ध्यान दिया होता। अब रामवती और माधुरी का क्या होगा ? रामदास का क्रोध शांत होता है। हत्या के अपराधबोध से रोने लगता है। माँ मैंने क्या कर डाला ? हत्या करने के बाद बहुत पछताता है। पर अब पछताने से क्या फायदा ? हत्या तो हो ही गई थी। माँ, अब बच्चों का पालन-पोषण कर शादी कर देना। मेरी किस्मत में यही लिखा था। मैं अपने कर्मों के फल अब जेल जाकर भुगत लूंगा।

रामदास आँखों में आंसू लिए नंगी तलवार और लाठी लिए घर से निकल पड़ता है। गाँव में सभी दरवाजे बंद मिले। कोई देखकर बात नहीं करता बल्कि दरवाजे को बंद कर लेते हैं। एक खूंखार हत्यारे को देखकर सभी भाग खड़े होते हैं। गाँव में सामलदास की हत्या की खबर आग की तरहफैल जाती है। सभीलोग देखने के लिए चल पड़त हैं। वहां सिर और धड़ अलग पड़े थे। जमीन में खून बह रहा थआ। वहां काली मिट्टी लाल हो गई थी। सामलदास की पत्नी और बच्चे व परिवार वाले चिल्ला-चिल्ला कर दहाड़ मारकर रो रहे थे। परिवार के सारे सदस्य रो रहे थे। गाँव वाले सांत्वना दे रहे थे। सामलदास की उम्र लगभग 45 वर्ष रही होगी। सामलदास नम्बरी बदमाश था। निहत्थे लोगों को मारना, पीटना, सूदखोरी, शराब बेचना उसका धंधा था। गाँव में सामलदास का आतंक था। गाँव के लोग दबे जुबान कह रहे थे कि अच्छा हुआ जो उस बदमाश को मार डाला। बेचारा रामदास जबरदस्ती फंस गया। मर्डर हो गया। उसका परिवार बर्बाद हो जाएगा। गाँव का कोटवार सायकिल से मस्तूरी थाना जाकर सामलदास की हत्या की जानकारी देता है। थानेदार बलवान सिंह 302 का जुर्म दर्ज कर एफआईआर रामदास जोगी के विरुद्ध दर्ज कर लेता है। और सूचना बताती है कि हत्या करने के बाद रामदास जोगी गाँव से ईटवा गाँव फिर अरपा नदी की ओर जाते लोगों ने देखा है। थानेदार तुरंत मोटरसाइकिल से पीछे सिपाही बिठाकर टिकारी गाँव तफ्तीश के लिए जाते हैं। गली में लाश पड़ी रहती है। भीड़ इकट्ठा रहती है। थानेदार को देखकर गाँव वाले वहां से खिसक जाते हैं। मात्र परिवार के सदस्य खड़े रहते हैं। कोटवार पास के घर से खाट मांकर ले आता है। मुख्य साक्ष्य में उनकी पत्नी और बच्चों का बयान लेता है। गाँव वाले कोई गवाही नहीं देते। पटवारी से स्थल का नक्शा तैयार कराता है। लाश को पोस्टमार्टम के लिए मस्तूरी शासकीय अस्पताल ले जाने के लिए कोटवार को बोलता है। बैलगाड़ी से लाश को मस्तूरी ले जाते हैं। एक घण्टे के भीतर लाश का पोस्टमार्टम कर थाने में आकर गुप्ता दे देता है। धारदार तलवार से सिर को धड़ से अलग करने की रिपोर्ट देता है। हत्या का पूरा प्रकरण बन जाता है। रामदास गाँव से ईटवा गाँव की ओर जाता है। एक घण्टे चलने के बाद वह अरपा नदी में पहुंचता है। नदी में तलवार लाठी फेंक देता है। अंधेरे तलवार नदी में गहरे डूब जाती है। लाठी धारा में बहने लगती है। रामदास पूरे कपड़े सहित नदी की धारा में मुँह डुबाकर स्नान करता है। एक घण्टे स्नान करते-करते अपने किए पर पछताता है। फिर जोर-जोर से दहाड़ें मारकर रोने लगता है। जितना क्रोध बढ़ाया उसे आंसुओं में बहाकर नदी में प्रवाहित कर देता है। स्नान करने से क्रोध शांत हो जाता है। फिर जीवन के बारे में परिवार की याद आने लगती है। फिर पुलिस का डर सताने लगता है। बहुत सोच विचार कर अन्त में तय कर पाया कि कहां जाया जाए। क्या किया जाए। पुलिस थाने में जाकर आत्म समर्पण किया जाए। अपराध तो हो गया है। क्षणिक उत्तेजना में क्रोध के कारण हत्या हो गई थी। रामदास बहुत पछताता है और अपने किए पर रोता है। क्या करे, कहां जाए – बार-बार दिमाग में उधेड़बुन चल रही थी। उधर रात का अंधेरा बढ़ रहा था। रामदास का मन स्थिर हुआ। बहुत समय बीतने के बाद याद आया चलो आज की रात नगाराडीह में बिताया जाए। सभी कपड़ों को साफ धोकर और सुखाते-सुखाते गाँव की ओर चला गया। कहां थानेदारी की नौकरी। कितने अपराधियों को पकड़ने के ईनाम मिले थे। आज अपराधी बनकर भाग रहा है। रामदास मन में सोचता है क्यों न फांसी लगाकर आत्महत्या कर लूं। परंतु रामवती, माधुरी और चन्द्रशेखर का क्या होगा सोचकर आत्महत्या का विचार छोड़ देता है। गाँव पास में था। जल्दी पहुंच गया। रामदास रात दस बजे दरवाजे को खटखटाता है। दरवाजा मनराखन सिंह खोलता है। रामदास के चरण स्पर्श करता है। रामदास भइया के चेहरे के रूप रंग को देखकर घबरा जाता है। पूछता है – कहां से आ रहे हो रात में ? नदी में नहाकर गाँव से ही आ रहा हूँ। लोटा में पानी पैर धोने के लिए लाता है। रामदास पैर धोकर एक लोटा पानी पीने के लिए मांगता है। रामदास की मूछें हमेशा ऊपर रहती थी। रामदास हट्ट-कट्टा था। चेरहे पर मूछें अच्छी लगती थी। अब पश्चाताप की लहरें चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी। भोजन करके रामदास सोने का प्रयास किया परंतु रात भर नंगी तलवार और कटा सिर बार-बार स्मृति में आ जाता था। रात भर अपराधबोध में खाट में इधर से उधर पलटता रहा। सुबह मनराखन ने पूछा – भइया रात भर सो नहीं पाए क्या कारण है ? रामदास मन के बोझ को हल्का करने करने के लिए हत्या करने की जानकारी दे देता है। रामदास ये भी कहता है – मैं कल मस्तूरी थाना जाकर आत्म समर्पण कर दूंगा। जीवन भर अपराधियों को पकड़ता रहा। आज मैं अपराधी बनकर भाग रहा हूं। रामदास सुबह पानी पीकर गाँव टिकारी के लिए चल पड़ता है। खलिहान की ओर से घर में जाता है। रामवती पूछती है – रात में कहां थे ? रामदास बताता है – मैं रात में नगाराडीह में था। रात भर सो नहीं पाया। रामवती कहती है – कल थानेदार साहब आए थे। गवाहों के बयान लेकर गए हैं। रामवती कहती है खाना खा लो और थाने जाकर अपना जुर्म कबूलकर लो। रामदास कुछ भोजन करता है। मनमोहन को कहता है कि भाई साइकिल में मस्तूरी ले चल। मनमोहन साइकिल में बिठाकर थाने ले जाता है। रामदास हत्या का जुर्म कबूल कर लेता है। थानेदार चालान बनाकर न्यायालय में प्रस्तुत करता है। रामदास को जेल भेजने का आदेश न्यायाधीश दे देता है। शाम को रामदास बिलासपुर जेल में हत्या के अपराध में बंद हो जाता है। रामदास विचाराधीन कैदियों के बीच में रहता है। कैदियों के कपड़े, कम्बल, चादर लेता है। उसके मुरझाए चेहरे को देखकर सभी समझाते हैं कि रामदास भोजन कर लो। परंतु उस रात वह भोजन नहीं कर पाता। पानी पीकर रात बिताता है। वहां के कैदियों को बताता है कि एक छोटी सी भूल क्रोध के कारण एक की हत्या हो गई मेरे हाथ से। मैं सहायक उपनिरीक्षक पुलिस विभाग में था। एक से बढ़कर एक अपराधियों को पकड़-पकड़ कर जेल भेज दिया करता था। आज मैं कैदी स्वयं हूं और एक अपराधी बनकर यहां आया हूं।

प्रस्तुतिः जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़

भाग- ग्यारह

रामदास कई दिनों से सो नहीं पाया था। दिन भर सोता रहा। मात्र भोजन के लिए उठा था। रामवती कहती है – अप घोड़ बेचकर सो रहे हो। माधुरी कहती है – माँ और पापाजी ने बहुत मेहनत की थी। पूरा पाली गाँव एवं आसपास में बाबूजी का नाम प्रसिद्ध हो गया है। मुझे तो बहुत मजा आया। मैं तो हीरोइन बनकर ठुमक रही थी। सभी बच्चे मेरे पीछे-पीछे रहते थे। सभी दीदी, दीदी कहकर चिल्लाते थे। आज घर सूना लग रहा है। माधुरी नानी माँ से सभी काम सीख रही थी। जब तक नानी थी, तब तक माधुरी चहकती फिरती थी। मौज मस्ती किस्सा कहानी सुनतीथी। मंगली बाई एक से बढ़कर एक कथा सुनाती थी। रामवती बारह दिन के बाद ही घर से निकलती है। रामदास डॉ. गिरधर शर्मा से नामकरण के लिए संपर्क करता है। डॉ. शर्मा जन्मपत्री बनाते हैं। नाम चन्द्रशेखर रखता है। रामदास पंडित जी को 251/- रुपए देकर चले जाते हैं।

श्री एक्का साहब थाने में रामदास को आरश्रक भेजकर बुलवाता है। आरक्षक जगजीवन प्रसाद को कहता है कि पाँच मिनट में आ रहा हूं। रामदास थाने पहुंच करदरोगा साहब को नमस्ते करता है एवं पास की कुर्सी पर बैठ जाता है। दरोगा साहब कहते हैं – जोगी जी कुछ करो। जब अफसर नहीं बने थे तो अच्चा काम कर रहे थे। थाने का नाम हो रहा था। बहुत दिन हो गए कुछ धमाका करो। रामदास कहता है – सर, आप आदेश करें तो कुछ करता हूँ। दरोगा साहब को निर्देश देकर रामदास चला जाता है। रामदास कुछ काम करता रहता है। उसी समय अम्बिकापुर से एक मुखबिर का टेलीफोन आता है कि एक मारुति वैन में तीन करोड़ रुपए की चरस, हेरोइन, गांजा, भांग रायपुर बेचने के लिए ले जा रहे हैं। वैन का रंग काला है। उत्तरप्रदेश सरकार का हो सकता है। रामदास के कान खड़े हो जाते हैं। रामदास एक चार का गार्ड लेकर सभी वाहनों की सघन जांच शुरू कर देता है। एक मारुति वैन रात को आठ बजे आती है। रामदास रुकवाता है, जांच करने पर कुछ नहीं मिलता है। वैन के एक-एक कलपुर्जे को देखता है, परन्तु कुछ भी नहीं मिलता है। रामदास निराश हो जाता है। तस्कर लोग बड़े चतुर होते हैं। गाड़ी बदल दिए होंगे। सपेद रंग की मारुति कार में रखकर माल ला रहे होंगे। कुछ देर के बाद मारुति आती है। रामदास कार रुकवाता है। परन्तु चालक नहीं रोकता। तेज गति से भागने लगता है। रामदास मोटरसाइकिल से भागने लगता है। वह तेज गति से कार का पीछा करता है। कुछ दूर जाने के बाद जंगल में गोलियां चलती हैं। रामदास गोलियों से बचकर चला रहा था और पीछा कर रहा था। रामदास अपने आरक्षक से टायर पर गोली चलाने के लिए कहता है। आरक्षक ने निशाना लगाकर गोली दागी। मारुति कार का टायर बस्ट हो जाता है। कार लड़खड़ाती हुई सड़क के किनारे साल के पेड़ से भिड़ जाती है। चालक और साथी कार से नीचे उतर कर घने जंगल में भाग जाते हैं। रामदास कुछ दूर तक पीछा करते हुए जाता है। तस्कर व चालक गोली दागते हुए घने जंगलों में भाग जाते हैं। रामदास मारुति कार से स्मेक, दस किलो चरस, पाँच किलो हेरोइन, पाँच किलो अफीम व 20 किलो गांजा जप्त कर एक ट्रक द्वारा थाने में ले आता है। थानेदार साहब को सूचना भिजवाता है। दरोगा झटपट कपड़े पहनकर आता है। रामदास जप्त सामग्री को बताता है। एक्का साहब रामदास को पकड़ने के लिए बधाई देता है। पकड़े गए चरस की कीमत पाँच करोड़ रुपए से अधिक थी। एक मुंशी को भेजकर ट्रेक्टर बुलाते हैं और मारुति कार को खींचकर थाना लाने को कहते हैं। मुंशी ट्रेक्टर से खींचकर मारुति कार को थाने में लाकर खड़ी कर देता है। मारुति कार के सामने का हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था। रामदास जप्ती की कार्यवाही कर मर्ग कायम कर लेता है। तस्करी का जुर्म कायम कर अज्ञात व्यक्ति के विरुद्ध दर्ज कर लेता है। दूसरे दिन फोटो सहित माल जप्ती के साथ रामदास का फोटो नवभारत, दैनिक भास्कर के मुख्य पृष्ठ में पाँच करोड़ के मादक पदार्थ जप्ती के समाचार प्रकाशित होते हैं। थानेदार अपने वरिष्ठ अधिकारियों को टेलीफोन से सूचना दे देता है। अखबार पढ़कर बड़े पुलिस अधिकारी आईजी, पुलिस अधीक्षक, डीआईजी घटनास्थल में मुआयना के लिए आ जाते हैं। केन्द्रीय आबकारी वभाग के अधीक्षक भी पाली थाना पहुंच जाते हैं। सभी का कहना था कि आज तक का सबसे बड़ा तस्करी का मामला पकड़ गया था। बारह बजे दिन को न्यायालय में प्रकरण प्रस्तुत किया जाता है। उपरोक्त सामग्री को जप्त कर केन्द्रीय आबकारी अधीक्षक बिलासपुर के सुपुर्द कर देता है। रामदास को सभी बधाई देते हैं। पुलिस विभाग को ऐसे कर्मचारी पर गर्व होता है। आईजी साहब पीठ थपथपा कर बधाई देते हैं। भारत सरकार सारी ईनाम राशि स्वीकृत वापस भेज देती है। 26 जनवरी में ईनाम राशि एवं पुलिस विभाग द्वारा स्म्मानित किया जाता है। रामदास खुशी से झूम जाता है। माननीय मंत्री जी के हाथों सम्मानित होता है। पुलिस ग्राउण्ड में रामदास जोगी सहायक निरीक्षक के कार्यों का बखान किया जाता है। रामदास को कई बार सम्मानित किय जा चुका है। आरआई बिलासपुर द्वारा जीवन वृतांत पढ़ा जाता है। पुलिस ग्राउण्ड तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता है। ऐसे पुलिस अधिकारी पर पुलिस विभाग को गर्व है। सभी कर्मचारियों अधिकारियों को सीख लेनी चाहिए। दूसरे दिन सभी अखबारों में प्रशंसा के समाचार छपते हैं। एक लाख रुपए के चेक को बैंक में जमा करा देता है। माधुरी रामवती समाचार पढ़कर बहुत खुश होती है। रामवती रामदास से कहती है कि बेबी बड़ी हो रही है। बिलासपुर में जमीन मकान बनाने के लिए खरीद लेते हैं। रामदास जहराभाठा, बिलासपुर में मैं चालीस बाई साठ चौबीस सौ वर्गफुट जमीन खरीद लेता हूं। मादक पदार्थ तस्करों द्वारा रामदास जोगी को जान से मारने एवं माधुरी का अपहरण कर लेने की धमकी देते हैं। रामदास और रामवती घबरा जाते हैं। थानेदार साहब बड़े अधिकारियों को जानकारी दे देता है। रामदास आईजी साहब से निवेदन करता है – सर मेरा तबादला कोरबा थाने में कर दिया जाए। रामदास का तबादला कोरबा सिटी कोतवाली में कर दिया जाता है। रामवती जल्दी सामान का पैकिंग कराने लगती है। रामदास दूसरे दिन कार्यमुक्त होकर कोरबा ज्वाइन करने चला जाता है। तबादला होने के बाद भी टेलीफोन से अपहरण करने की धमकी देते रहते हैं। थानेदार सशस्त्र गार्ड ड्यूटी में लगा देते हैं।

रामदास दूसरे दिन ज्वाइन करने कोरबा थाने पाली पाली से बस में बैठकर कोरबा पहुंच जाता है। थानेदार श्री कतलम साहब को अपनी उपस्थिति रिपोर्ट देता है। कतलम रामदास को एक खाली क्वार्टर आबंटितकर देता है। रामदास दो कोटवार लेकर कमरे की साफ-सफाई करता है। तीसरे दिन पूरा सामान ट्रक में भरकर कोरबा ले आते हैं। रामवती माधुरी को पास के कन्या शाला में कक्षा आठवीं में भर्ती करा देती है। कोरबा में माधुरी पढ़ने लगती है। रामदास जान बचाकर कोरबा आ गए थे। रामदास के अच्छे काम को कतलम साहब जानते थे। कतलम साहब साहब ने रामदास को कहा – यहां पर भी कुछ करके दिखाओ। थाना को ठीक करो। रामदास कहता है – सर, पाली थाने से जान बचाकर भाग कर आया हूँ। ईमानदारी से काम करने पर जान का खतरा बनता है। इसलिए सर, मैं भी अन्य अफसरों की तरह कार्य करूंगा। जरूर मैं थाने की कार्यपद्धति बदल दूंगा। कतलम साहब हमेशा रामदास को पीछे मोटर साइकिल में दौरे में साथ ले जाता था। रामवती कोरबा में खुश थी। क्योंकि पाली एक बड़ा गाँव था। रामदास भी सभी स्टाफ के साथ एडजस्ट कर न्याय कर रहे थे। इधर थाने के रिकॉर्ड को रामदास ठीक करवा देता है। रामवती कभी-कभी सिनेमा देखदेखने के नीहारिका टाकीज अथवा कोरबाटाकीज जाती थी। माधुरी को साथ लेकर मार्केट भी चली जाती है। चन्द्रशेखर एक बरस का हो जाता है। कोरबा थाने में रामदास ऐसे ही काट देता है। कतलम साहब रामदास से कहता है – यार, कुछ तो जौहर दिखाओ। रामदास पर जुनून सवार हो जाता है। रामदास कहता है – सर, एक दो दिन में जोरदार धमाका करूंगा। रामदास उधेड़बुन में इधर-उधर घूमने लगता है। रामदास को मालूम रहता है कि नकली शराब का कारखाना यहां चल रहा है। कतलम साहब से अनुमति लेकर एक बड़े नकली शराब बनाने के कारखाने में दिन में सशस्त्र सिपाही लेकर छापा मारता है। बड़ी-बड़ी कम्पनियों के लेबल चिपका कर करोड़ों रुपए की कर चोरी पकड़ में आती है। लगभग एक करोड़ रुपए से अधिक की नकली शराब जप्त करता है। शराब मानक स्तर से निम्न पाई गई। जहरीली शराब की हजारों बोतल पाई गई। शराब स्केण्डल का समाचार सभी अखबारों में छपता है। आबकारी विभाग के निकम्मेपनएवं जांबाज पुलिस अफसर की बड़ाई छापी जाती है। कतलम साहब रामदास का कार्यों से प्रसन्न हो जाते हैं। परन्तु नकली शराब काण्ड का प्रकरण बनाकर न्यायलय में चालान दर्शन सिंह के खिलाफ प्रस्तुत कर देता है। दर्शन सिंह उच्च न्यायालय से जमानत में छूटकर आता है। दर्शन सिंह अपने बदनामी एवं बरबादी के लिए रामदास को दोषी मानकर बदले की कार्यवाही करने की योजना बनाता है। थानेदार साहब को टेलीफोन से रामदास को जान से मारने की धमकी देता है। कतलम साहब टेलीफोन पर कह देता है कि तुझे जो कुछ करना है मेरे खिलाफ कर। दर्शन सिंह रामदास ने मेरे आदेशों का पालन किया है। यदि करना है तो मेरे खिलाफ करो। दर्शन सिंह रामदास के पीछे आदमी लगा देता है। सुपारी देकर बांदा से अपराधी बुला लेता है। रामदास भी सतर्क हो जाता है।कतलम साहब कहीं आने-जाने नहीं नहीं देता। हमेशा अपने साथ रखता है। कतलम साहब अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दे देता है। कतलम थानेदार एवं रामदास बाजार में अतिक्रमण हटाने के लिए गए थे। सभी अधिकारियों के बीच में रामदास के ऊपर सुपारी वाले बदमास राममिलन देशी कट्टे से गोली दाग देता है, किन्तु निशाना नहीं लग पाता है। बदमाश स्कूटर से भागने में सफल हो जाता है। उधर थानेदार जान से मारने, गोली चलाने के जुर्म में दर्शन सिंह के विरुद्ध मामला दर्ज कर लेता है। रामदास डर जाता है। रामवती इस घटना से रामदास से भारी नाराज हो जाती है। रामवती के बार-बार समझाने पर भी महीं मानता। कभी ईमानदास, साहसी और पराक्रमी व्यक्ति चुप नहीं बैठ सकता। रामवती थानेदार साहब के पास जाती है। रामदास के स्थानांतरण कराने का निवेदन करती है। कतलम साहब समझाता है – डरने की कोई बात नहीं है। रामवती कहती है – सर, सभी हमारे परिवार की जान के दुश्मन बन गए हैं। अपरादी बदले की भावना से वार कर रहे हैं। कतलम पूरा आश्वासन देता है कि कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। रामवती निराश और उदास । रामदास घर में चन्द्रशेखर को खिलाता रहता है। थानेदार कतलम दर्शन सिंह को कोतवाली में बुलवाता है। परन्तु दर्शन सिंह नहीं आता। चार सशस्त्र सिपाही भेजकर गिरफ्तार कर लेता है। थाने के लॉकअप में बंद कर देता है। दर्शन सिंह से सारी जानकारी लेता है कि आपने गोली क्यों चलवाई ? दर्शन सिहं इंकार करता है। कतलम एक थप्पड़ गाल में रसीद करता है। फिर आरक्षकों को निर्देश देता है कि मारो साले को। बड़ा ईमानदार बनता है। पुलिस विभाग पर गोली चलवाता है। जितने सिपाही होते हैं वे सभी लात, घूंसों से उसकी खूब पिटाई करते हैं। दर्शन सिंह लात का भूत था, बातों से नहीं मनता कहावत ठीक लगी। अपना जुर्म कर लेता है। थानेदार एफआईआर दर्ज कर चालान बनाकर कोर्ट में प्रस्तुत कर देता है। न्यायाधीश खूंखार अपराधी मानकर बिलासपुर सेंट्रल जेल भेज देता है। उच्च न्यायलय से जमानत पर छूट कर आता है। परन्त दर्शन सिंह झट मान जाता है और कतलम साहब थानेदार के साथ समझौता कर लेता है, फिर धीरे से अपना पुराना धंधा शुरू कर लेता है। इधर रामदास भी स्वतंत्र रूप से निडर होकर काम करने लगता है। पुलिस विभाग में रामदास का नाम बड़े गर्व के साथ लेते थे। रामदास पहले जैसा साहसिक काम करने लगा। उधर रामवती माधुरी की पढ़ाई में ध्यान देने लगी। माधुरी कक्षा आठवीं प्रथम श्रेणी में पास हो जाती है। रामदास माधुरी को आगे बिलासपुर में होस्टल में रखकर पढ़ाने की तैयारी करता है।

प्रस्तुतिः जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़

Monday, August 28, 2006

भाग - दस
रामदास कार्यमुक्त होकर पाली थाने जाने के लिए मुंगेली से बस में बैठते हैं। मुंगेली से बिलासपुर। बिलासपुर से बस द्वारा पाली चले जाते हैं। बस थाने के पास रुकती है। थानेदार साहब टी.एस.एक्का को ज्वाइनिंग रिपोर्ट देता है। एक्का साहब सामदास जोकी के कार्य पद्धति के बारे में सुन चुके थे। रामदास का स्वागत करता है। कहते हैं – रामदास जैसे मुंगेली थाने का आदर्श रूप बनाया था, वैसा पाली थाना आदर्श बनाओ। रामदास कहता है कि सर, आपके मार्गदर्शन और सहयोग से वैसा ही बन जाएगा। हम लोग प्रयास करेंगे। रामदास की ईमानदारी, व्यवहारकुशलता अच्छे वर्कर, कानून के जानकार, नागरिकों से अच्छा संबंध, सभी अधिकारियों से अच्छा संबंध। एक्का साहब को एक और सहयोगी मिल जाता है। एक्का साहब मुंशी के प्रभार में रख देता है। रामदास कार्य प्रभार लेता है। रामदस पहले थाने के अभिलेख, शस्त्रागार, के अभिलेख को ठीक करता है। अपराध पंजी, उपस्थिति बंजी, केस बुक, रुका पुस्तिका। व्यक्ति मस्त। कार्यालय को एक दिन में ठीक कर लेता है। कोटवार से ताने की सफाई कराता है। एफआईआर पंजी को भी ठीक करता है। रामदास को एक क्वार्टर जो मुंशी का खाली रहता है, थाने केम्पस में आबंटन कर देता है। एक-दो दिन रूम की सफार् तो कोटवारों से कराता है। रामदास दो दिवस की छुट्टी लेकर सामान लेने मुंगेली जाता है। रामवती, माधुरी रामदास से पूछती है कि स्थान कैसा है? कमरा ठीक है कि नहीं ? रामदास बताता है कि सभी ठीक है। दरोगा साहब भी ठीक है। रामदास सामान की पैकिंग कोटवार को बुलाकर करता है। मुंगेली से मेटाडोर पाली के लिए किराए पर ले लेता है। ट्रांसपोर्ट कंपनी का मेटाडोर था, जो सामान ले जाने का काम करते थे। रामवती सभी रसोई के सामान को पैक बक्से में करती है। सिर्फ रात में खाना बनाने के सामान छोड़ देती है। बाकी सामान कोटवार लोग कर देते हैं। रामदास नए थानेदार मटल बंजारे साहब से भेंट करता है। बंजारे साहब रामदास से परिचित थे। बंजारे साहब अम्बिकापुर से आए थे। जटिवार वहीं थे। रामदास मुंगेली थाने के बारे में सभी कुछ बता देता है। विधायक महोदय के बारे में बताता है। सब ठीक है। नमस्ते कहकर चला जाता है।

दूसरे दिन मेटाडोर में सामान भरकर रामदास रामवती, माधुरी सामने बैठकर मुंगेली से पाली पहुंच जाते हं। रामदास घर के सामने मेटाडोर खड़ी करवाता है। थाने से तीन कोटवार एक कुली बस स्टैण्ड से पकड़कर सामान खाली कराता है। रामवती रसोई के सामान को जमाती है। रामदास कोटवार को पलंग, कुर्सी, पेटी, अलमारी, पंखा, कूलर, गेहूं, चना, चावल के ड्रम घंटे भर में सामान उतारकर जमा देते हैं। रामवती, माधुरी स्नान करके भोजन बनाने के लिए तैयारी करती है। कोटवार से बाजार से सब्जी मंगाता है। मेटाडोर को किराया देकर छोड़ देता है।रामदास भी स्नान करके कपड़े पहनकर थाने में जाता है। दरोगा साहब बैठे रहते हैं। साहब पूछते हैं – रामदास पूरे सामान सहित आ गए ? रामदास कहता है – सर मेरी एक बच्ची है एवं मेरी पत्नी। तीन प्राणी। एक्का साहब कहते हैं – अच्छा... अच्छा। रामदास कल से कमाल दिखाओ। थाने को चुस्त-दुरुस्त करो। रामदास ने जवाब दिया – ठीक है सर...। कल से काम शुरू। सर सुबर की परेड में आप भी आइए ना। सबका परिचय और ड्यूटी हो जाएगा। रामदासअपने निवास चला जाता है। रामवती बढ़िया दाल, भात, बैंगन की भुजी पकाती है। टमाटर, धनिया, हरी मिर्च की चटनी। तीनों एक साथ बैठकर खाना खाते हैं। नई जगह में परिचय बाद में होता है।बगल वाले कमरे में रामप्रकाश पाण्डे आरक्षक रहते थे। उसके दोनों बच्चे माधुरी के संग खेलने, परिचय करने घर में आते हैं। दोनों में जल्दी परिचय हो जात है। रात अदिक हो रही थी, रामदास राजू को को घर जाने को कहता है। राजू अपने घर चला जाता है। रामवती की नींद नई जगह में नहीं पड़ती है। माधुरी सो जाती है। रामवती रामदास को कहती है – नींद नहीं आ रही है। रामदास कहता है प्रयास करते हैं। नई जगह में थोड़ी देर में नींद आएगी। पति पत्नी रतिरस लीन हो जाते हैं। रतिक्रीड़ा के बाद दोनों थोड़ी देर गप मारते हैं। दोनों की नींद कब पड़ती है, सुबह सात बजे नींद खुलने पर पता चलता है। रामवती सुबह उठकर चाय बनाती है, परन्तु अपने लिए। रामदास चाय नहीं पीते थे। पान, तम्बाकू भी नहीं खाते थे। मांस, मछली, दारू, चोंगीका नामनहीं लेते थे। पूरे पंडित महंत के गुण थे। रामदास सुबह आठ बजे थाना पहुंच जाते हैं। सुबह परेड में सलामी लेता है। सभी लोगों से परिचय भी हो जाता है। थानेदार साहब रामदास के कारनामे सभी लोगों को सुनाता है – रामदास ने कई खूंखार हत्यारों को पकड़ा है। आईजी साहब से इनाम भी मिला है। रामदास सभी आरक्षकों को कहता है – साथियों सभी मिलकर देश सेवा करेंगे। पाली थाना को आदर्श थाना बनाने के लिए सभी कड़ परिश्रम कर अपराधियों को पकड़ेंगे। दारू, जुआ, सट्टा सभी को बंद कराएंगे। ये सामाजिक बुराई है। दरोगा साहब सबको हिदायत देकर ड्यूटी बांट देते हैं। रामदास थाने में बैठे-बैठे रंगीन पेनों से सभी रजिस्टरों को लिख रहे थे। प्रगति प्रतिवेदनों को रंगीन स्याही से ग्राफ बना रहे थे। जिससे वर्षानुसार अपराधी की जानकारी देखते ही प्राप्त हो जाए। सभ अपराधों को वर्षवार सारणी बना रहेथे। रामदास ने कोयला चोरी का ग्राफ बनाया। विभाग में जाकर क्यों न आज वाले डम्पर को पकड़ा जाए ? रामदास ने तत्काल एक शस्त्रधारी आरक्षक को बुलाया। संतराम सड़क से जो कोयला भरकर बिलासपुर की ओर जाए रोक लेना। अवैध टेकरियां चल रही हैं। सबको थाने परिसर में खड़ी कर दो। बिना लाइसेंस, परमिट के सवारी ढो रहे थे। रामदास ने थानेदार से कहा – सर चालान बनाकर न्यायालय में पेश कर देते हैं। तभी ठीक होंगे। बड़े साहब ने हस्ताक्षकर कर कोर्ट भेज दिया। कोर्ट में जुर्माना जमाकर जीप छोड़ी गई। इस कार्यवारी से अवैध वाहनों का चलना बंद हो गया। एक अवैध रूप से चल रही अम्बिकापुर विडियो कोच बस को बिना परमिट चला रहे सन्तराम ने पकड़ा। फिर इसका चालान बनाकर न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया गया। भारी राशि दण्ड केरूप में बस मालिक को भरना पड़ा। दूसरे दिन बस मालिकों ने थानेदार से शिकायत की कि नया आया मुंशी हम सब लोगों को जबरदस्ती तंग कर रहा है। एक्का साहब ने सबको डांटा – तुम लोगों को शर्म नहीं आती, एक ईमानदार कर्मचारी के खिलाफ शिकायत करते हो। ये सब मेरे आदेश से हो रहा है। थानेदार ने दुत्कार दिया। बस मालिक मुँह लटकाए चले गए। आरक्षक संतराम ने एक और कोयला से लदे ट्रक को रोककर थाने के सामने खड़ा कर दिया। रामदास ने ट्रक के कागजात मांगे। ट्रक ड्राइवक ने कागजात दिखाए। परन्तु कोयला का कोई परमिट नहीं दिखा पाया। रामदास ने चोरी का केस दर्ज कर लिया। एक्का थानेदार ने चालान बनाकर न्यायालय में उसी दिन प्रस्तुत भी कर दिया। न्यायादीश महोदय को चोरी वाला केस कर ट्रक को जप्त कर लिया गया। ट्रक मालिक रामू अग्रवाल बिलासपुर से आया। रिश्वत देने की पेशकश परन्तु दरोगासाहब एवं रामदास नहीं माने। रामू अग्रवाल धमकी देकर चला गया – मैं देख लूंगा, तुम लोग क्या समझते हो ? मेरा भाई विधायक है। रामदास ने कहा – ठीक है, कुछ कहना है कोर्ट में कहना। दूसरे दिन कोयला से भरे ट्रक थाने में खड़े कर दिए गए। किसी के पास परमिट भी नहीं था। जो परमिट पास दिखाया गया, दो बार समय बीत गया था। सबके विरुद्ध अवैध परमिट का मामला पंजीबद्ध कर जाँच के लिए स्वयं रामदास एवं एक्का साहब गए। बांकी मोंगरा खान के पास था। बांकी मोंगरा गेवराकोयला खदान जाकर जाँच का कार्य प्रारंभ किया। कोयला खदान के गेट पास, सिक्यूरिटी गार्ड के रजिस्टर को उस पास परमिट को को नोट करना शुरू किया। एक हजार रुपए के परमिट में दस हजार टन कोयला कई महीनों से ले जा रहे थे। रामदास ने सभी रजिस्टरों से उतार एवं फोटोकॉपी कर सुरक्षा गार्ड से ले लिया। एक्का एवं रामदास महाप्रबंधक गेवरा प्रोजेक्ट के कार्याल में गए । परमिट नम्बर का मिलान किया गया। परमिट का पास तो एक हजार टन था जिसकी तारीख से माह बीत गया था। महाप्रबंधक से बयान लिया। महाप्रबंधक को जानकारी दी कि इस परमिट के द्वारा ट्रांसपोर्टरों ने एक लाख रुपए का कोयला चोरी करवया है। अभी तो दस हजार टन कोयले की चोरी पकड़ी गई है। रामदास ने संबंधित सुरक्षा गार्डों, सेल्स मैनेजर, सुपरवाइजर एवं प्रबंधक के बयान लिए। इस चोरी काण्ड में संतरी से लेकर अधिकारी तक शामिल थे। सबका पुरातन अभिलेख लेकर चोरी एवं शासकीय धन को हानि पहुंचे एवं अवैध रूप से ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए अपराध पंजीबद्ध रामदास कर लेता है। दूसरे दिन चालान बनाकर न्यायालय बिलासपुर में प्रस्तुत कर देते हैं। न्यायाधीश महोदय अपराध रजिस्टर कर लेते हैं। सभी लोगों को गिरफ्तार करने का वारंट भी काट देते हैं। सभी ट्रकों को जब तक निर्णय न हो जाए, खड़ी करने का आदेश पारित कर देते हैं। दूसरे दिन अखबारों में छपा कि एक लाख टन चोरी का कोयला पकड़ा गया, जिसमें कोयला खदान के अधिकारियों के खिलाफ जुर्म दर्ज कर जारी किए गए। कोयला खदान के अधिकारियों में हड़कम्प मच गया। करोड़ों रुपयों की कोयला चोरी का भण्डाफोड़ हो गया। बड़े अधिकारी उच्च न्यायालय से जमानत करवा आए। शेष सभी ट्रक ड्राइवरों को जेल में बंद होना पड़ा, फिर उच्च न्यायालय से इन लोगों को जमानत मिल गई। पुलिस अधीक्षक ने कोयला चोरी काण्ड का भण्डाफोड़ करने के लिए रामदास को बधाई दी एवं धमकियों से नहीं डरने की सलाह भी दी। पुलिस अधीक्षक ने एक्का साहब को निर्देश दिए कि रामदास को एक रिवॉल्वर आबंटन कर दें। रामदास को रिवॉल्वर मिल गया। एक्का साहब भी बहुत प्रसन्न हुए। रामदास के कारण पाली थाना का नाम अखबारों में छाया रहा। कोयला का स्थानांतरण करने के लिए आवेदन दिए।आईजी साहब ने पाली जाकर रामदास को बधाई दी कि कोयला माफिया को पकड़ने में कामयाबी हासिल किया। इस प्रकरण से पुलिस महकमे के विश्वसनीय छवि में वृद्धि हुई। न ही पुलिस विभाग को सबा मामले में शामिल मानते हैं, एसईसीएल मुख्यालय बिलासपुर में विशेष जाँच मुख्य सुरक्षा अधिकारी से कराते हैं। सभी कोयला खदानों में गरही जांच चलती है। कोयला चोरी के अनेकों मामले प्रकाश में आते हैं। कोयला माफिया इन खदानों से पचार करोड़ रुपयों का कोयला जोरी कर हजम कर गए है। इसलिए सेल इंडिया ने परमिट जारी करने में सावधानी बरतना शुरु कर दिया। इससे शासन को अरबों रुपए का लाभ मिला। दक्षिण पूर्वी कोयला प्रक्षेत्र लिमिटेज ने रामदास एवं एक्का थानेदार को छत्तीसगढ़ के लोग महोत्सव बिलासपुर के कार्यक्रम में माननीय मंत्री महोदय द्वारा सम्मानित किया गया। रामदास एवं एक्का साहब की जोड़ी बन गई थी। इस प्रकार रामदास को कार्य करते हुए, पाँच माह हो गए थे। माधुरी को प्राथमिक पाठशाला पाली में कक्षा दूसरी में भर्ती करा दिया गया। माधुरी को छोड़ने रामवती प्रतिदिन सुबह सात बजे जाती है। कभी-कभी रामदास भी चला जाता था। एक दिन सुबह रामवती माधुरी को स्कूल छोड़ने जा रही थी। स्कूल के सामने एक मारुति वैन रुकी और माँ बेटी को फिल्मी स्टाइल में अपहरण कर भागने जबरदस्ती खींच कर वैन में बैठाने का प्रयास किया गया। रामवती जोरजोर से चिल्लाती है – बचाओ-बचाओ। स्कूल के स्टाफ वाले आ जाते हैं। सभी बच्चे वैन को घेर लेते हैं। अपहरणकर्ता अपहरण नहीं कर पाते। हवाई फायर करके कोरबा की ओर धमकी देते हुए भाग जाते हैं कि आइंदे से कोयला ट्रक को पकड़ा तो जान से मार डालेंगे। रामवती रोती-रोती घर आती है। पूरे अपहरण का वाकया सुना देती है। रामदास थानेदार साहब को जानकारी देता है। थानेदार अपहरण के मामले में अज्ञात व्यक्ति एवं कोयला माफिया के विरुद्ध मामला दर्ज कर लेते हैं। एक्का साहब स्वंय जांच के लिए पहल करते हैं। थानेदार पुलिस अधीक्षक को सूचना दी कि सर रामदास की पत्नी एवं बच्ची को कोयला माफिया द्वारा अपहरण करने का प्रयास किया गया। स्कूल के सभी स्टाफ आ गए। चीखने एवं चिल्लाने से भीड़ जुट गई थी। मारुति वैन में फिल्मी स्टाइल में जबरदस्ती खींच कर ले जा रहे थे, जब माँ-बेटी ने इसका विरोध किया तब भाग खड़े हुए। पुलिस अधीक्षक ने रामदास की सुरक्षा बढ़ाने के लिए कहा। रामदास की सुरक्षा बढ़ा दी गई। रामदास के घर में सशस्त्र गार्ड लगा दिए गए। रामवती, माधुरी, रामदास को कोसते हैं कि तुम विभाग के बड़े ईमानदार बनते हो। ईमानदारी के कारण आज अपहरण होते-होते बच गया। खूब रोती है। यदि गोली मार देते तो तुम क्या कर लेते। रामदास बहुत समझाता है। माधुरी को अपनी छाती से चिपकाकर खूब रोती है। रामदास भी रोने लगता है कि सतनाम की कृपा से आज मेरा परिवार बच गया। रामदास रामवती को शांत कराता है। कहता है कि रामवती स्नान कर आज गुरुजी को अगरबत्ती, फल चढ़ाकर नारियल फोड़ दे। आज बाबाजी ने बचाया है। रामदास, रामवती माधुरी स्नान करके बाबाजी की चरण पादुका के चित्र की पूजा करते हैं। रामवती कहती है – तुम जैसे अन्य पुलिस वाले काम करते हैं, वैसे काम क्यों नहीं करते ? क्या तुम्हीं ने अकेले पुलिस विभाग को सुधारने का ठेका लिया है। तुम्हारे एक से, पुलिस विभाग की छवि थोड़ी सुधर जाएगी। जब सभी लोग रिश्वत के सहारे जी रहे हैं तो तुम क्यों ईमानदार बनते हो। तुम्हारी ईमानदारी से हम लोगों को क्या मिला, जलालत, अपहरण। रामवती साफतौर पर चेतावनी देती है – तुम आज से किसी दुनियादारी में मत पड़ना। नहीं तो मैं माधुरी को लेकर गाँव में रहूंगी। रामदास विचलित हो जाता है। एक तरफ कर्तव्य, ईमानदारी, दूसरी तरफ बीवी-बच्चे। रामदासअपने किए पर पछतावा करता है। रामवती को वचन देता है – मैं आज से ये सब नहीं करूंगा। भले रिश्वत नहीं लूंगा पर किसी को रोकूंगा भी नहीं। रामदास माधुरी को गले लगाकर खूब रोता है। रामवती भी रोती है। पड़ोस वाले आकर ढाढस बंधाते हैं। एक्का साहब भी आकर सांत्वना देते हैं। रामवती चाय बनाती हूं कहकर रसोई में चली गई। सभी लोग बैठे शोक मना रहे हैं। कोयला माफिया के बढ़ते हौसले को धिक्कार रहे थे कि पुलिस वालों के साथ ऐसा व्यवहारतो आम नागरिकों के साथ क्या नहीं हो सकता। रामवती की आँखें रोते-रोते सूख गई थी। चाय लेकर आती है। सब कोई समझाते हैं कि डरने की कोई बात नहीं है। एक्का साहब ने बताया कि पुलिस अधीक्षक महोदय कने तीन सशस्ज्ञ गार्ड घर में लगाने के लिए आदेश दिया है। बहुत सावधान होकर रहना पड़ेगा। फिर सभी थाने लौट जाते हैं। कोयला माफिया से सभी पुलिस वालों की माहवारी बंधी हुई थी। सब बंद हो गया। इसलिए सभी रामदास एवं एक्का साहब का विरोध करने लगे थे। ईमानदार दो बाकी सब बेईमान। इसलिए रामदास को स्टाफ के खूब विरोध का सामना करना पड़ रहा था। एक आरक्षक ने तो यहां तक कह डाला – सर, औप दोनों परिवार निश्चिंत और सम्पन्न हैं। मेरी तो पाँच-पाँच लड़कियां विवाह के लिए पड़ी हैं। तुम लोगों के कारण अवैध आमदनी बंद हो गई। अवैध परिवहन बंद हो गया। अवैध दारू, जुआ बंद होगया। सभी जगह से पूरे थाने के स्टाफ अफसर के लिए एक लाख रुपए माहवारी आता था। बंद होगया है। हमारे परिवार भूखों मरने की कगार पर आ गए हैं। सभी रामदास के खिलाफ एकजुट दिखे। तब थानेदार ने क्रोध में सिपाही को डांटा – तुमने बच्चे अधिक क्यों पैदा किए ? काम तो धेला भर का नहीं करते और बच्चे पैदा करने में अव्वल। सिपाही माफी मांगकर भाग खड़ा होता है। रामदास अपने कर्मों के लिए पछतावा करता है। परन्तु इतना सम्मान, इज्जत कहां मिलती। ईमानदारीपूर्वक कर्तव्य पूरा करने के लिए आज पुलिस विभाग में रामदास का नाम अमर है। मन को मसोस कर रह जाता है वह। रामदास सोचने लगता है कि आप जैसे पुलिस कर्मचारी जैसा कार्य करते हैं वैसा मैं भी करूंगा। ऐसा जरूर मन होता है। अखबार में अपहरणकाण्ड प्रमुखता से छपता है। ईमानदार पुलिस कर्मी रामदास का मन सांसत के मारे बेचैन हो जाता है। पुलिस विभाग से लेकर विधानसभा सत्र में भी विरोधी पक्ष के नेता अखबार को उछालते हुए कहते हैं कि राज्य में पुलिस प्रशासन नाम की कोई चीज नहीं है। जब ईमानदार पुलिस कर्मी रामदास के बीवी-बच्चों की सुरक्षा नहीं कर सकते, तो सामान्य नागरिकों का क्या होता होगा ? विधानसभा में विपक्षी सरकार को आड़े ह्थों लेते हैं एवं सरकार को कटघरे में खड़े कर देते हैं। जोरदार हंगामा होता है। गृहमंत्री से बयान देने की मांग करते हैं।
गृहमंत्री द्वारा विधानसभा में वक्तव्य दिया जाता है कि रामदास एक जांबाज, कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार सिपाही है, उसकी सुरक्षा सरकार कर रही है। एक तीन के गार्ड निवास पर लगाए गए हैं। चौबीस घंटे सिपाही ड्यूटी पर लगाए गए हैं। कोयला माफिया को पकड़ने के प्रयास जारी हैं। अपराधियों को शीघ्र पकड़ लिया जाएगा। रामदास पुलिस विभाग की शान है। इन्होंने बड़े खूंखार अपराधियों को पकड़ा है। रामदास ने कोल इंडिया के अरबों के कोयला चोरी का भण्डाफोड़ किया है। इसमें विभाग के बड़े-बड़े अफसर फंस रहे हं। इसलिए रामदास के परिवार का अपहरण करने का प्रयास किया गया। गृहमंत्री के जवाब से विपक्ष असंतुष्ट होकर सभा से बहिर्गमन कर गए। पुनः सदन में मुख्यमंत्री ने वक्तव्य दिया कि हम पूरी सुरक्षा की गारंटी करते हैं। अपहरणकर्ताओं को एक माह के भीतर पकड़वाएंगे। इसकी सीआईडी जांच होगी। विपक्षी नेताओं कर्तव्यनिष्ठ हवलदार की पदोन्नति करने की मांग की। मुख्यमंत्री ने सदन को आश्वासन दिया कि ऐसे जांबाज, ईमानदार कर्मचारी को पदोन्नति दी जाएगी। मुख्यमंत्री के बयान से विपक्ष सहमत होगया। सदन की कार्यवाही पूर्ववत चल पड़ती है। शाम सात बजे के समाचार में रामदास जोगी हवलदार पाली थाने कोक्रम से पूर्व पदोन्नति देने की घोषणा मुख्यमंत्री ने विधानसभा में की है। रामदास के परिवार को पूरी सुरक्षा प्रदान की जावे। पुलिस विभाग ने पुलिस महानिरीक्षक बिलासपुर को फोन से निर्देश दिए। उप पुलिस महानिरीक्षक बिलासपुर ने रामदास जोगी को हवलदार से सहायक पुलिस निरीक्षक के पद पर पदोन्नति आदेश जारी कर देते हैं। रामदास जोगी को पदोन्नति का आदेश पाली थाने में मिल जाता है। रामदास रामवती को पदोन्नति का आदेश दिखाता है। रामवती, माधुरी पुलिस आरक्षकों की सुरक्षा में दिन रात घर में कैद हो जाते हैं। रामवती का खिला चेहरा धीरे-धीरे मुरझे लगता है। कहीं भी स्वतंत्रतापूर्वक आ जा नहीं सकते थे। दो गार्ड हमेशा पीछ-पीछे रहते। सावन के महीने में रामदास रामवती से कहता है कि चलो आज मंदिर चलते हैं। माधुरी तैयार हो जाती है। रामवती कपड़े पहनकर तैयार हो जाती है। रामदास कपड़े पहनकर मंदिर के लिए तैयार हो जाते हैं। रामदास, रामवती, माधुरी आगे-आगे तथा पीछे-पीछे सशस्त्र गार्ड चलते हैं। दुकान से अगरबत्ती, माचिस, नारियल खरीदते हैं। मंदिर के पास से फूल, माला व प्रसाद खरीदते हैं। तालाब के घाट में पैर धोते हैं। पास में जूते उतार देते हैं। पाली के प्राचीन मंदिर में भगवान शंकर के शिवलिंग की पूजा अर्चना अगरबत्ती, फूल, नारियल, प्रसाद चढ़ाते हैं। रामवती, रामदास, माधुरी सुरक्षा गार्ड पूजा करते हैं। रामदास की सात वर्ष की सेवा में ये पदोन्नति मिल जाती है। कर्मचारी से अफसर के स्तर पर आ जाता है। रामवती पाली में ठीक नहीं रह पाती है। रामवती का मन उदास रहने लगा। माधुरी को घर में पढ़ाती थी। माधुरी परीक्षा में प्रथम स्थान पर आती है। कक्षा तीसरी में प्रवेश पाती है। रामदास जोगी एवं एक्का साहब की जोड़ी खूब जमती थी। दोनों अफसर बहुत सीधे सादे थे। किसी को परेशान नहीं करते थे। रामदास का सभी लोगों से समझौता हो जाता है। जीपें, बस, ट्रक, डम्पर चलने लगते हैं। देसी शराब, अंग्रेजी दुकान और सट्टा से मासिक वसूली में हिस्सा रामदास को दस हजार रुपए बिना मांगे घर में देकर चले जाते थे। रामदास को रामवती ने समझाया कि बिना रिश्वत मांगे कोई घर में राशि पहुंचाकर चला जाता है। इससे अच्छा तो कोई काम नहीं। तेरे को किसी से हाथ फैलाने की जरूरत नहीं है। न रिश्वत मांगने की। मेरी समझ में अब तुम आँख मूंदकर काम करो। यहां से ट्रांसफर करा लो। रामदास की समझ में आ जाता है। रामवती की गरीबी दूर होने लगती है। अधिकारी बनने पर घर को ठीक रखना पड़ेगा। कुर्सी, टेबल, सोफासेट एक माह के में खरीदता है। दूसरे माह रामवती के लिए सोने की चेन खरीदता है। इस प्रकार से प्रतिमाह घर में अतिरिक्त राशि रामवती के हाथ जाता रहता था। रामदास रुपयों को हाथ नहीं लगाता था। रामवती घर को सजाती है। रामवती का मन पूर्व की भांति प्रफुल्लित रहने लगता है। रामदास अपने घर पिताजी के नाम से एक हजार रुपए मनीआर्डर भेज देता था। झालर महंत के लिए पहनने के लिए खाकी वर्दी, कमीज, पुराने कमीज धोती, फुल पैंट भेज देता था। दो फसली खेती किसानी के लिए अतिरिक्त रुपए भेज देता था। इस प्रकार घर भी भरापूरा हो गया था। रामवती रुपए बचाकर जमा करते जा रही थी। दो वर्ष पाली में रह जाते हैं। माधुरी कक्षा पाँचवीं में पास हो जाती है। रामदास व रामवती बहुत खुश होते हैं। रामवती कहती है कि भगवान एक बेटा दे दे। रामदास बाबाजी का आह्वान कर कहता है कि सतनाम साहेब, मेरा घर पुत्र के बिना सूना है। यदि मेरे घर में पुत्र पैदा होगा तो गाँव में जैतखाम गड़वाऊंगा। गिरौदपुरी धाम में जोड़ा जैतखाम में ध्वजा इसी साल चढ़वाऊंगा। पति, पत्नी अगरबत्ती जलाकर पूजा करते हैं। बाबाजी को स्मरण करते हैं। रामवती के मुँह से आत्मा बोलती है – बेटा हमारी आत्मा भटक रही है। किसी की कोख खाली नहीं है। मैं तुम्हारा पुत्र बनकर रामवती के कोख से जन्म लेने पर ही मेरी आत्मा को शांति मिलेगी। रामदासकहता है दादा जी आप मेरे पुत्र बनकर आओगे तो बहुत खुशी होगी। मणिदास की अत्मा चली जाती है। रामवती को होश आ जाता है। रामवती हाथ मुँह धोती है। खाना खाकर दोनों सो जाते हैं। रात में रामवती रामदास को रतिक्रीड़ा के लिए निवेदन करती है। शायद आज का दिन अच्छा है। मासिक धर्म से रामवती निवृत हुई रहती है। रामदास बाबाजी को स्मरण करता है। रामवती गर्भ उसी दिन धारण कर लेती है। रामदास अपने आप में व्यस्त रहने लगता है। रामदास कबी कोटजा, कभी करछोंटा, बिलासपुर न्यायालय की पेशी में जाने लगता है। रामवती अनमने ढंग से रहती है। तीन माह बाद रामवती को पूरा विश्वास हो जाता है कि गर्भधारण हो चुका है। रामदास को बताती है। रामदास बहुत खुश हो जाता है। माधुरी भी सयानी होने लगती है। माधुरी कक्षा 6 में पढ़ने लगती है। माँ को रसोई में सहयोग करती है। अब सभी काम माधुरी सीख गई थी। शाम के समय का भोजन माधुरी बनाती थी। रामवती को कुछ अच्छा नहीं लगता है। रामदास ईमली, अचार, आम, नींबू, करौंदा बाजार से खरीदकर लाता है। इस प्रकार से रामवती के नौ माह होने लगते हैं। रामवती अपनी माँ मंगली बाई को बुलाने के लिए रामदास को कहती है। रामदास एक गाँव सेंथरी बिलासपुर से लौटते हुए जाता है। माँ को अपने साथ बस में बैठाकर पाली ले आता है। रामवती माँ को झुककर प्रणाम करती है। माँ आशीर्वाद देती है – पुत्रों की माँ बनो। रामवती कहती है – माँ एक बेटा अच्छा स्वस्थ हो। माधुरी नानी को पैर छूकर प्रणाम करती है। नानी कहती है – मेरी बेटी सयानी हो रही है। माधुरी को चुम्मा लेती है। प्यार से गोदी में बिठा लेती है। माधुरी शाम को भोजन पकाती है। माधुरी नानी से पूछती है – मेरा भाई होगा या बहन। नानी बोलती है तुझे क्या चाहिए ? माधुरी कहती है मुझे तो भाई चाहिए। नानी कहती है – ठीक है, तुझे भाई मिलेगा। भोजन करने के बाद सब सो जाते हैं। माधुरी नानी माँ से कथा-कहानी कहने को कहती है। एक कथा परी रानी की कहती है। माधुरी सुनते-सुनते सो जाती है। सभी सो जाते हैं।

रामदास प्रसूता के लिए पूरे सामानों की लिस्ट लिख लेता है। दुकान से सामान लेकर आ जाता है। रामवती देखभाल अच्छे ढंग से माँ 15 दिन करती है। रामवती को माँ घुमाती-फिराती रहती है। धीरे-धीरे रामवती चलती है। पेट एकदम बाहर निकल जाता है। बच्चे का मुँह नीचे हो जाता है। रामवती की पीड़ा धीरे-धीरे बढ़ने लगती है। दिनभर रामवती प्रसव पीड़ा से कराह रही थी। मंगली बाई बेटी को सांत्वना देती रहती है। माधुरी भी माँ के पास बैठी रहती है। रामदास इधर से उधर चलता रहता है। रातभर पीड़ा से सभी नहीं सो पाते। रामवती को घर के आंगन में चलवाती रहती है। सुबह पाँच बजे आदिवासी मोहल्ले की झोंपड़ियों से मुर्गे की बांग सुनाई देती है। रामदास कहता है – सुबह अस्पताल में भर्ती कर देंगे। मंगली कहती है ठीक है। रामवती की पीड़ा अचानक बढ़ जाती है। माँ द्वारा रावती को थोड़ा जोर से धक्का देने के लिए बोलती है। रामवती जोर से चिल्लती है – अई माँ...। बच्चे का मुँह बाहर दिखने लगता है। मंगली हाथ से बच्चे के सिर को छूती है। मंगली रामवती को कहती है – बेटी सिर किनारे आ गया है। जरा हिम्मत से जोर से धक्का लगा। रामवती पसीने से लथपथ देखती है। माँ की सांत्वना पाकर रामवती पीड़ा सह जाती है। एकाएक पीड़ा बढ़ती है। मंगली बाई बच्चे का सिर पकड़कर बच्चे को बाहर निकाल लेती है। बच्चा बहुत स्वस्थ रहता है। इसलिए रामवती को तकलीफ ज्यादा होती है। अस्पताल में होती तो डॉक्टर लोग आपरेशन कर देते। माँ के सधे हाथों से बच्चा साधारण ढंग से पैदा हो जाता है। बच्चा रंग रूप में सुन्दर था, दादाजी के ऊपर गया था। मंगली रामवती के कपड़े बदलती है। बच्चे को गरम पानी से नहलाती है। रामदास बच्चे को टॉवेल में लपेटकर गोद में लेता है। चूमने, दुलारने, प्यार करने लगता है। माधुरी को एक खिलौना भाई मिल गया था। माधुरी नानी के साथ रह रही थी। बहुत प्रसन्न थी। घर में खुशी का माहौल था। बच्चे के रोने से पड़ोसी देखने के लिए आने लगते हैं। थानेदारिन भी आ जाती है। थाने परिसर के सारे घरों को पता चल जाता है कि रामवती के बहुत दिनों के बाद लड़का हुआ है। थाना के आरक्षक एवं दरोगा साहब रामदास से कहते हैं कि ऐसे काम नहीं चलेगा। दो किलो लड्डू मंगाओ। रामदास आरक्षक को भेजकर लड्डू मंगाता है। थाने में आरक्षक सभी लोगों को लड्डू बांटते हैं। परिसर में सभी घरों में सिपाही द्वारा लड्डू भिजवाते हैं। थाने में आने-जाने वालों को मालूम हो गया और पाली में हल्ला हो गया कि छोटे दरोगा साहब के लड़का हुआ है। सभी लोगों ने बधाइयां दी। रामदास गद्गद होकर बधाई स्वीकार कर रहे थे। रामदास गाँव में, ससुराल, सभी रिश्तेदारों को निमंत्रण भेजता है। गाँव जाकर स्वयं माँ, बाबूजी को ले आता है। गाँव के अन्य मित्रों को निमंत्रण देता है। गाँव में लड़का होने का समाचार फैल जाता है। सभी दोस्त लोग अच्छी पार्टी देने के लिए जोर दे रहे थे। सभी को छट्ठी का निमंत्रण देकर आ गया। रामदास छट्ठी की तैयारी में लग जाता है। घर में मेहमानों का आना शुरू हो जाता है। पाली के रेस्ट हाउस को अधिकारियों के लिए आरक्षित करा लेता है। रामवती एवं बच्चा दोनों ठीक रहते हैं। रामदास घर में विचार करते हैं कि गाँव से मंगल चौका, आरती एवं पंथी पार्टी बुलाया जाए। रतनपुर से रतनपुरिया भजन मंडली को नंत्रण दे दिया जाए। दोनों जगह सिपाही भेज कर नारियल एवं निमंत्रण देते हैं। सभीलोग जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। रामदास के पूरे परिवार वाले बड़े पिताजी जगतारणदास, मनमोहनदास भाई, बहन मनोरमा तीन बच्चों के साथ आ जाती है। घर में सोने के लिए जगह नहीं बचती। दरोगा साहब एक्का के बाहर वाले एक कमरे में दरी बिछाकर पुरुष लोग सो जाते हैं। कुछ लोग रेस्ट हाउस में सोते हैं। पूरनदास एवं एक सिपाही निवास के बगल में खाली पड़ी जगह में चालीस बाई साठ के टेंट लगा देते हैं। दौ सौ कुर्सियां लगा देते हैं। पूरे थाने परिसर में मेला जैसा माहौल रहता है। बच्चे लोग नाचते गाते रहते हैं। उझल कूदकर खुशियां मना रहेथे। रामदास ने भोजन बनाने के लिए एक होटल वाले को ठेका दे दिया था। जो दो दिन पहले से घर की रसोई बना रहे थे। पाली के मशहूर रसोइया पंडित श्यामरतन पाण्डेय भोजन बना रहे थे। बहुत बढ़िया भोजन पकाकर खिला रहे थे। पूरे थाना परिसर में दो दिन से किसी के घर में भोजन नहीं बना। सब एक साथ बैठकर भोजन कर रहे थे। एक परिवार के सदस्य जैसे बन गए थे। एक्का साहब ने कहा – वाह... भई रामदास, तुमने तो सब लोगों को एक सुख की डोर में बांध दिया। रामदास ने कहा – सर ! आपकी मेहरबानी से हो रहा है। सभी आरक्षक व व परिवार उसके काम में हाथ बंटा रहे थे। रामवती गरम पानी से नहलाया गया। बड़े ओखद में जगली जड़ी-बूटी डालकर पानी को गरम किया गया। रामवती गरम पानी से स्नान कर तरोताजा हो जाती है। घर की साफ-सफाई, कपड़ों की धुलाई धोबी से करा लेते हैं। रामवती बच्चे को स्नान कराकर खुद नए कपड़े पहनती है एवं बच्चे को भी नए कपड़े पहनाती है। रामवती घर के देवता में अगरबत्ती जलाकर पूजा करती है। नारियल चढ़ाती है। संत कुरू घासीदास जी के चित्र पर फूल चढ़ाकर अगरबत्ती जलाकर पूजा करती है। रामवती कहती है – हे ! सतनाम, सतपुरुष साहिब, मेरे बच्चों को ठीक रखना। मेरा तो दूसरा जन्म हुआ है। भगवान अच्छा रखना। मेरे परिवार को सुखी रखना। जय सतनाम। रामवती सभी बड़े लोगों माँ, बाबूजी, सास, ससुर, बड़े पिताजी सबके चरण छूकर प्रणाम करती है। सभी से आशीर्वाद लेती है। मंगली, शांति के आँखों से आंसू निकल जाते हैं। शांतिबाई कहती है – बेटी (बहू) गाँव की सभी महिलाएं पहले कहती थीं कि तुम्हारी बहू अब बांझ हो गई है। एक लड़की पैदा करके कोख सूनी हो गई है। बहू मेरे वंश को चलाने के लिए बेटा देकर मेरे परिवार को तार दिए (मोक्ष कर दिए)। रामवती चरण छूकर आशीर्वाद लेकर चली जाती है। रामवती को बढ़िया शक्तिवर्धक पौष्टिक लड्डू, तिल गुड़, सोंठ, अलसी के लड्डू खिलाते हैं। छट्ठी में आए महिला पुरुषों को कांके पानी जड़ी-बूटी का पेरू पिलाया-खिलाया जाता है। लगभग पाँच सौ आदमियों को रामदास भोजन कराते हैं। गाँव, ससुराल से पचास से अधिक लोग आए रहते हैं। सभी लोग रामदास के भोजन की तारीफ करते हैं। पाली के व्यापारी वर्ग, अधिकारी वर्ग भोजन ग्रहण करके बधाई देते हैं। दोपहर चार बजे से मनोरंजन का कार्यक्रम प्रारंभ किया जाता है। पण्डाल के मंच में रतनपुरिया भजन, पंडित रामदयाल तिवारी, रामपुरी गोस्वामी एवं साथियों का भजन होता है। श्रोतागण सुनकर मुग्ध हो जाते हैं। रतनपुर महामाई की जय...।

भजन –
ठाकुर भला बिराजे हो,
अजब विराजे महामाया हो माँ।

कृष्ण जन्म, बालकृष्ण का सुन्दर वर्णन करते हैं। सुलभ प्रसंग गाए जाते हैं। हजारों की संख्य में भीड़ में बहुत सराहे गए। पंडित जी को श्रीफल, शाल ओढ़ाकर थानेदार एक्का साहब ने सम्मानित किया। रामदास ने पाँच सौ इक्यावन रुपए भेंट दिए। एक घण्टे तक भजन संगीत चलता रहा। भजन के बाद में प्रसिद्ध पंथी नर्तक देवदास बंजारे एवं साथियों का आकर्षक नाच प्रस्तुत किया गया। जब देवदास बंजारे एवं साथियों ने खुला बदन, धोती सफेद जनेऊ पहनकर, पांव में घूंघरू, जब लाइन से मंदिर के पास ताललय के साथ नाचते जय सतनाम जय साहब गुरू बाबा क जय, मंच पर आए तो तालियों की गड़गड़ाहट से आकाश गूंज उठा।

पंथी गीत –
गगन मंदिर तोर बासा गुरू हे।
मोर गगन मंदिर तोर बासा।
निर्मल ज्ञान के प्रकाश।
गुरू मोर गगन मंदिर तोर बासा।
सत में ही धरती, सत में ही आकाश।
सत में गुरू बाबा संत खण्ड बाबा।
सत, सत अमृत वाणी, ज्ञान के प्रकाश।
निर्मल ज्ञान के प्रकाशा, गगन मंदिर तोर बासा।

पंथी गीत

लहराए तोर नाम के निशान पवन में अहो सतनाम।
कौन कौन नाम के खम्माला गड़ाए हो –
कौन-कौन रंग के झंडाला चढ़ाए हो।
चांद सूरज नाम के खम्माल गड़ाए हो।
सादा सा सफेद रंग के झंडा ला चढ़ाए हो।
तोर महिमा केअपार तो...
अबंरा घबरा पेड़ तरी धुनील रमाए हो।
गिरोदपुरम जोड़ा खम्माल गड़ाए हो।
अमृत कुंड हे महान....।।

पंथी गीत तेज गति से नृत्य को मांदर के रूप में नाचते देखना मनमोहक दृश्य था। पंथी गीत के साथ दर्शक लोग नाचने लगे थे। आनंद विभोर होकर सभी लोग देख रहे थे। पाली में पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर के कलाकार द्वार पंथी गीत प्रस्तुत किया गया था। सभी लोगों मजा आ जाता है। देवदास बंजारे एवं साथियों को धोती, जनेऊ देकर सम्मानित करते हैं। साथ में आने-जाने के लिए किराए की राशि देता है। देवदास कासम्मान एस.डी.ओ.पी. साहब जवाहर सिंह द्वारा किया जाता है। देवदास को ईनाम बतौर पाँच हजार रुपए भी दर्शकगण देते हैं। बहुत ही अच्छा सफल आयोजन होता है। लगभग एक घण्टे ततक कार्यक्रम होता है। रामदास जोगी देवदास के साथ में पंथी नाचता है। रामदास पुराने पंथी पार्टी वाले थे। स्कूल के समय में पंथी नृत्य किए थे।

तीसरे क्रम में करमा ददरिया के कार्यक्रम रहता है। श्रीमती कुलवन्तिन एवं पंचराम मिरझा मांदर के थाप के साथ पांव में घुंघरू बांध कर आते हैं। सभी लोगों को नमस्कार ककर ददरिया प्रस्तुत करते हैं।

ददरिया –
बटकी मां बासी अउ चुटकी मा नुन।
मैं गावत दरिया तय ठाड़े-ठाड़े सुन।
पीपर के पाना डोलत नई ए रे।
मोर संगवारी हरिसाय है।
बोलत नई रा रे।
पानी रे आये पवन संग जाय।
आमा टोरे खाहूंच कहिके।
तय मोला दगा मा डारे, आहून कहिके।

मांदर के थाप में कुलवन्तिन बाई झूम के नाची। एक दूसरे को जोंग जोंग के ददरिया सुनाए मन को मोह लेते हैं। लोक कला, लोक गीत के अद्भुत दृश्य प्रस्तुत किए गए।

अंत में दो आदिवासी करमा नृत्य गीत प्रस्तुत किए गए। समा बंध जाता है। कार्यक्रम के लिए पाली के निवासी रामदास को बधाई देते हैं। ऐसा आयोजन पहली बार पाली में हुआ था। सभी लोगों को भोजन कराकर रामदास बिदा कर देते हैं।

एक्का साहब बहुत खुश होते हैं। थाने परिसर में समारोह का माहौल था। दो दिन तक काफी चहचहाहट थी। रामदास के परिवार के सदस्यों को छोड़कर सभी मेहमान रात में अपने-अपने घर चले जाते हैं। छट्टी के भात एवं कार्यक्रम को देखकर गाँव के लोग बहुत मजा लेते हैं। झालरदास एवं आसकरण दास, पूरन सभी सामने के कुर्सी पर बैठकर देख रहे थे। रामदास पर बहुत गर्व करते हैं। झालर दास कहता है – बेटा मेरा नाम को ऊँचा कर दिया रे, आज तक समाज में किसी ने ऐसा खिलाया है न पिलाया है। न ऐसा अद्भुत कार्यक्रम कराया है। रामदास जोगी के सालों ततक पाली के लोग याद करेंगे। बिलासपुर से पधारे डॉ. विनय पाठक, श्री शिवप्रताप सावजी, डॉ. विनय सिन्हा जी, श्री सोमनाथ यादव, पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी, श्री पालेश्वर शर्मा, श्री गोविन्दराम मिरी, रामेश्वर कोसरिया सभी बड़े प्रसन्न मन से कार जीप में बैठकर रात में बिलासपुर आ जाते हैं। खिलावन प्रसाद दूसरे दिन रायपुर चला जाता है। सभी मेहमान मंगली बाई को वहीं छोड़कर चले जाते हैं।

प्रस्तुतिः जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़